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Saturday, November 3, 2012

रिश्ता अंधेरों का... रिश्ता आवाज़ों का...

वो आज जा रहा है.. दूर... मुझसे दूर, जाने किसी के पास या सबसे दूर!




अब उसे परेशान करना चाह कर भी मैं उस तक नहीं पहुंच पाऊंगी. उसकी आवाज़ की ताजगी शायद अब लम्बे अरसे तक नसीब ना हो. बासी पुरानी आवाज़ से काम चलाना होगा जो तेल, चीनी, नमक डाल कर कण्टरों में भर कर Preserve कर दी है.

उसने एक बार कोई कहानी सुनाई थी जिसमें लोग पेडों को confession box बना कर अपना सारा सच फूंक आते थे लकडी के कानों में. अब चूंकि मुझे भी बदले में कुछ कहना था तो मैंने भी उसे अपने बचपन से उठा कर एक कहानी अपनी सांसों में gift wrap कर के दी थी जिसमें पेडों से बने साज़ों ने लोगों के सारे सच दुनिया के सामने उजागर कर दिये थे.

उसकी सारी समझदारी भरी बातों के जवाब में बस मेरा जाहिलपन ही मुखर होता था मगर फिर भी वो कहता था कि "हम दोनों एक-दूसरे के confession box हैं." बिना इस डर के कि  हमारे सचों के लिये हमसे नफरत भी की जा सकती है, हम एक-दूसरे के कान में बिना झूठ की मिलावट के कभी शहद से मीठे और कभी ज़हर से कडवे सच उगल देते थे. और उन दिनों में अक्सर सोचा करती थी कि अच्छा है जो हमारे बदन की हड़ी-चमडी से कोई साज़ नहीं बनाये जा सकते और जिस तरह उसके सच मेरे साथ खाक़  हो जायेंगे, मेरे सच भी दुनिया की नज़रों से बचे रहेंगे. वैसे अगर मेरे सच उसकी दुनिया में सरे-बाज़ार हुये भी तो क्या ही फर्क पडने वाला है! ये भी एक तसल्ली ही है कि उसकी दुनिया  में मुझे और मेरी दुनिया में उसे कोई नहीं जानता.

समझ ही नहीं आता जाने कैसे तो शब्दों का जामा पहनाया जा सकेगा हमारे रिश्ते को. कैसा अजीब सा किसी परिभाषा में ना बंध सकने वाला रिश्ता.. उन रिश्तों से एक दम अलग जो अपने पुरअसर वजूद के साथ आप पर हावी नहीं रहते.

ऐसा रिश्ता जो होता है तब भी आपको नहीं बांधता और जब नहीं होता तब भी आपको भरोसा होता है कि कहीं कोई तो है जिससे कभी भी कुछ भी बेझिझक कहा जा सकता है, बिना judge किये जाने के डर के.ऐसा रिश्ता जिसमें भरोसा रहता है कि चाहें लाख अंधेरे आपको घेर लें, एक जगह ऐसी भी है जहां रौशनी है... जहां जा कर खुद को ढूंढा जा सकता है... जहां तमाम guilts के बाद भी आंखों में आंखें डाल के बात की जा सकती है.

रिश्ता जिसे नाम देना चाह कर भी किसी रिश्ते की हद में नहीं बांधा जा सकता... रिश्ता जो कोई नाम ओढते ही मैला पड जायेगा.. प्यार, परिवार, दोस्ती, वासना इन सबमें थोडा-थोडा बंटा हुआ और फिर भी इन सबसे परे... रिश्ता अंधेरों का... रिश्ता आवाज़ों का... रिश्ता आज़ादियों का... रिश्ता मेरा और तुम्हारा

Wednesday, April 25, 2012

तुम्हें सोच कर...



"बुद्धू... गंवार... अनपढ... पागल लडके"
"क्या बात है! आज बहुत प्यार आ रहा है?"
"किसी को बुद्धू, गंवार, अनपढ तब कहते हैं क्या कि जब प्यार आता हो? तुम तो सच में ही पागल हो."
"अरे हां, तभी तो कहते हैं... तुम्हें नहीं पता?"
"नहीं... सब कुछ तुम्हें ही तो पता होता है."
"हां, ये भी है. चलो फिर हम ही बता देते हैं कि ये सब तब कहते हैं जब खूब... खूब...खूब प्यार आ रहा हो लेकिन छुपाना बताने से ज़्यादा आसान लगे."
"और जब कोई किसी को नालायक कहे तब? तब भी क्या सामने वाले पर टूट कर प्यार आ रहा होता है?"
"हां, तब भी... फर्क बस इतना है कि तब आप छुपाना नहीं, जताना चाहते हो"
"ह्म्म्म्..."
"समझीं... नालायक लडकी?"
"...."
"...."
"...."
"क्या हुआ? सच में समझ गईं क्या?"
"तुम्हारी बकवास सुन लें वही क्या कम है जो समझने की भी मेहनत करें?"
"फिर खामोश क्यूं हो गई थीं?"
"तुम्हें ये बताने के लिए कि हम हद वाला पक जाते हैं तुम्हारे फालतू फण्डों से.."
"इतना बुरा लगता हूं?"
"इससे भी ज़्यादा बुरे लगते हो."
"आच्छा???"
"हां... इतने बुरे... इतने बुरे कि अगर सामने होते तो तुम्हारी उंगलियां काट लेते ज़ोरों से"
"उंगलियां?"
"हां... उंगलियां. क्योंकि ये जादू जानती हैं, लिखती हैं तो मन कोरा कागज़ बन जाना चाहता है... छूती हैं तो पत्थर की मूरत..."
"फिर तो इन्हें सच में ही सज़ा मिलनी चाहिये कि ये उसकी जान सोख कर मूरत बना देना चाहती हैं जिसमें मेरी जान बसती है."
"अबे तेरे की!!! डायलॉग!!! "
"शुरु किसने किया था?"
"उसने जिसे शुरुआत से डर नहीं लगता."
"फिर तो वो तुम हरगिज़ नहीं हो सकतीं. तुम्हें तो आगाज़ से बडा डर लगता है."
"तब तक कि जब तक अंजाम के सुखद होने का भरोसा ना हो."
"और अगर मैं कहूं कि कोई मुश्किल तुम्हे छू भी नहीं पायेगी, तो?"
"तो मैं मान जाऊंगी... तुम कितने भी बुरे सही, झूठे नहीं हो."
"और?"
"और... हां!!!"
"उस सवाल के लिए जो आज सुबह मैंने पूछा था?"
"नहीं, उस कुल्फी के लिए जिसके लिए कल ना कह दिया था... ओफ्फो! तुम सच मे ही बुद्धू हो लडके."
"और बुद्धू लडका तुम्हें पा कर बहुत खुश है."
"और???"
"और ... और.. I Love You"
"Oh! say something else boy. I hate predictable people."
"ओके... तुम.. तुम बहुत बडी वाली नालायक हो."
"ह्म्म्म्... अब सुनने में नॉर्मल लग रहा है."

इस बात को बरसों बीत जाने के बाद भी लडकी को लडके की उंगलियां बिल्कुल पसन्द नहीं हैं कि आज भी लडके का लिखा पढ के वो सब भूल कर कोरे यौवन के दिनों में पहुंच जाती है.. आज भी अगर लडका उसे छू भर ले तो पल दो पल को सांस ऐसे थम जाती है जैसे सच ही मूरत बन गई हो...

Wednesday, April 11, 2012

हुआ है कभी ऐसा.. तुम्हारे साथ???

वो रात-बेरात अपनी अधपकी नींद से एक झटके के साथ उठ कर बैठ जाती और फिर तमाम दराजों को टटोलने लगती. जबकि ये बात उसे भी पता होती कि वो जो ढूंढ रही है उसे अगर दराजों में सहेज कर रखा जा सकता तो खुदा ने इंसान को आंसुओं की नेमत नहीं बख्शी होती और इंसानों ने नींद की दवाओं का आविष्कार नहीं किया होता.

जब मनचाही चीज़ कहीं किसी कोने में नहीं मिलती तो उसे अपने चेहरे पर ढूंढने के लिये वो कमरे में लगे आदमकद शीशे के सामने खडी हो जाती और उस सुकून को खोजने की कोशिश करती जो मां के चेहरे पर बिखरा रहता था लेकिन अपने चेहरे पर उसे अपने पिता से विरासत में मिली कठोरता और व्यावहारिकता के मेल से बनी कोई अजीब-सी चीज़ फैली हुई मिलती.

तब वो खुद से बातें करने लगती.. खुद से भी नहीं, किसी और से जो भले उस कमरे मे मौजूद नहीं था लेकिन लडकी की रग-रग में बडे हक़ के साथ बसा हुआ था. उससे तेज़ आवाज़ में पूछती...



पार की है कभी एक रात से अगली सुबह तक की दूरी खुली आंखों से? वो भी तब जब मालूम हो कि हर दर्द से पनाह बस नींद ही दे सकती है... मगर नींद के आगोश में छुप जाना मुश्किल लगा हो क्योंकि आंखें बंद कर के इस दुनिया से मुंह फेर कर आप एक नई दुनिया ज़िन्दा कर लेते हो... खुद के भीतर.

कभी सोने से डर लगा है कि नींद अब वैसे सपनों का हाथ पकड कर नहीं आती जिनके टूट जाने का अफसोस होता हो?

कभी बांए हाथ के किसी नाखून को दांए कंधे पर ज़ोर से कुछ ऐसे गडाया है कि दर्द की लहर कई देर तक बदन में बहती रहे? फिर उस दर्द को अपने जिस्म की चौकीदारी में छोड कर गये हो कभी तन की सरहदों और मन की हदों के पार?

... और ठीक उन्हीं पलों में खुद से मीलों दूर इत्मिनान से सोते किसी शख्स की आवाज़ सुनने की तलब बही है आंखों की कोर से कान के पास वाले बालों को भिगोती हुई?

यादों के दरवाज़े को ज़ोरों से भडभडा कर गिडगिडाए हो कभी कि बस एक बार वो खुल जाएं और लौट आने दे बिसरी बातों, बिछडे लोगों को वापस तुम्हारे पास?

नहीं... तुमने ऐसा कुछ भी, कभी भी महसूस नहीं किया. वरना उस रोज़ तुम्हारी चौख़ट से वापस लौटते हुये मेरी गीली आंखों ने खिडकी के शीशे के परे तुम्हारी पीठ पर पसरी बेपरवाही को मेरा मज़ाक बना कर हंसते ना देखा होता... तुम्हारी सिगरेट के धुंए मे ही सही, कहीं तो तुम्हारी आंखों की नमी दिखती मुझे...

मेरे दर्द को समझने के लिये तुम्हें दौडना होगा किसी अजनबी के पीछे बेतहाशा, दोनों हाथ हवा में उठाए किसी अपने का नाम पुकारते हुए.. करनी होगी अपनी मनपसंद किताबों से बेपनाह नफरत और... सीखना होगा हुनर चीखों से संगीत निचोडने का...

और शायद तब तुम जान पाओ कि मेरी आवाज़ में जो रिसता था, वो मेरा इश्क़ था.. तुम्हारे लिये. जब दर्द ही दवा सरीखा लगने लगेगा और दुआओं से भरोसा उठ जायेगा तब तुम जान पाओगे की मुहब्बत करना कितना मुश्किल काम है...

जब मेरी ज़िन्दगी के ये सारे दर्द तुम्हारे अंदर ज़िन्दा हो जाएं और कहीं किसी कोशिश, किसी नुस्खे, किसी टोटके से कोई आराम ना मिले तब... तब बस एक बार मुझे दिल से याद करना.. बस एक बार शिद्दत से मेरे नाम को पुकारना. बस उतना भर कर देने से ही मैं तुम्हें अपने सारे खून माफ कर दूंगी. अपने अंदर के 'मैं' की हत्या के इल्ज़ाम से बरी कर दूंगी... बाइज़्ज़त.

और ये सब इस्लिये नहीं कि तुम्हें चाहती हूं, बल्कि इसलिये कि ऐसा ना कर पाने तक मैं खुद भी आज़ाद नहीं हो पाऊंगी.

पता है, हर सांस मरना और हर मौत जीना आसान नहीं है. ये ऐसे है जैसे किरच-किरच दर्द को खरोंच कर खुद से होते हुए बहने का न्यौता देना और फिर ज़ार-ज़ार रोना... जैसे ज़ख्मों को चीखों में तब्दील होते हुये देखना और उन चीखों का वापस जिस्म से टकरा कर ज़ख्मों में बदल जाना... जाने तुम समझ भी रहे हो या नहीं, लेकिन ये सच में उतना ही मुश्किल है जितना तुम्हारा मुझसे मुहब्बत और मेरा तुमसे नफरत करना...

Wednesday, March 21, 2012

तुम मेरे जानने वालों में सबसे बुरे हो लडके...


बचपन में अम्मा अक्सर भूत-प्रेत, ऊपरी असर, ना जाने कौन्-कौन सी अलाओं-बलाओं से बचाने के लिये झाडा लगवाने ले जाती थीं. ज़रा जुकाम हुआ नहीं कि नज़र उतारने के बीसियों टोटके तैयार... आज अगर वो होतीं तो पूछते कि फरिश्तों के असर से निज़ात दिलाने के लिए कहीं कोई झाडे नहीं लगते, कहीं कोई तन्त्र-मन्त्र नहीं करता क्या कि मेरी रूह पर लम्बे अरसे से एक फरिश्ते ने कब्ज़ा कर रखा है...

फरिश्ता है इसलिये कोई खास तक़लीफ तो नहीं देता लेकिन ये भी क्या कम कोफ्त है कि आप पर आपसे ज़्यादा किसी और का हखो जाये? आप हंसना चाहो और तभी फरिश्ते की कोई उदासी आ कर होठों से सारी मुस्कुराहट सोख ले जाये... उलझनों से आजिज़ आ कर आप मौत के साथ एक long drive पर जाने की तैयारी में हो कि बस फरिश्ता हाथों में हाथ डाले किसी अनजान राह पर दूर तक पैदल ले जाये और रास्ते में कमर पर उंगलियां फेर कर इस तरह गुदगुदाये कि आपकी हंसी से बंध कर तमाम खुशियां ज़िन्दगी में चली आयें.

वो मुझे मेरी ज़िन्दगी जीने का सच में एक दम ही कोई मौका नहीं देता और मैं उस से इतनी नफरत करती हूं जितनी कि मैंने बचपन में किसी से अपने रंग चुरा लेने पर भी नहीं की होगी.

बेशक वो फरिश्ता है लेकिन अपनी (और अब उसके साथ बंटी हुई) ज़िन्दगी में मैं जितने भी लोगों से मिली हूं उनमें वो सबसे बुरा है... सबसे बुरा. और उसकी सबसे बुरी बात ये है कि जब मैं उसे ये सब कहती हूं तो उसे पता चल जाता है कि ये बस एक तरीका भर है उसे बांहों में भर लेने को उठने वाली तलब को झिडक कर वापस सुला देने का...

Tuesday, March 20, 2012

बस... एक आवाज़ भर है!!!


ये भी क्या कम सुकून है कि तुम्हारी आवाज़ मेरी पहुंच के बाहर नहीं है कि इसे तुम खुद ही सहेज गये हो शायद मेरे ही लिये. तुम्हारा अक्स कभी छाया बन कर मेरी आंख की पुतली से नहीं गुज़रा. तुम्हारी खुश्बू कभी मेरी सांसों के साथ जकडी हुई मेरे फेफडों में पहुंच कर हमेशा के लिए कैद हो कर नहीं रह गई. लेकिन, तुम्हारी आवाज़... तुम्हारी आवाज़ मेरे खुले बालों को हौले से परे हटा कर मेरे कानों को सहलाती हुई जाने कौन-से रास्ते से मेरे दिल तक पहुंची है.
और अब तुम्हारी आवाज़ दिन-रात मेरे अंदर बात-बेबात... वक़्त-बेवक़्त... तेज़ी से चक्कर काटती रहती है. जब बहुत ज़्यादा घुटने लगती है तब शायद दिल से उठ कर गले तक आती है. पल भर के लिए कोई गोला-सा फंस जाता है गले में, मैं देर तक अपनी ही आवाज़ सुनने को छटपटाती रहती हूं कि तुम तो जानते ही हो कि मुझसे सन्नाटा बर्दाश्त नहीं होता. ये सन्नाटा आपको खुद को समझने का कुछ वक़्त दे देता है और मैं अपने आप को समझ कर एक बार फिर सब कुछ उलझाना नहीं चाहती. ख़ैर.. गले में अटकी तुम्हारी आवाज़ कुछ देर बाद, कभी तुम्हारी याद 'की' हिचकी या कभी तुम्हारी याद 'में' सिसकी के साथ आज़ाद हो जाती हूं और फिर अंदर जैसे सब खाली हो जाता है...

और इस खालीपन को भरने के लिए गुस्सा, अवसाद... मेरी घुटती सांस और फंसती आवाज़ के जाने कितने संगी बिन बुलाये चले आते हैं. बडे हक़ के साथ मेरे अंदर आवारा टहलते रहते हैं... तब तक कि जब तक तुम्हारी आवाज़ एक बार फिर आ कर सब कुछ आबाद ना कर दे, किसी ज़िम्मेदार मां की तरह अपनी बेटी के बिगडैल दोस्तों को झिडक कर भगा देती है... मायके से कई रोज़ बाद लौटी गृहस्थिन की तरह अपने अस्त-व्यस्त घर को, पति को और पति की फूंकी सिगरेटों के अधजले टुकडों को देखती है और बस पल्लू कमर में खोंस कर वो सब कुछ निकाल बाहर करती है जो बेवज़ह है.

कहने को बस एक आवाज़ भर है लेकिन कितनी मुकम्मल.. कितनी पूरी है. और नासमझों को लगता है कि इश्क़ करने के लिए किसी शख्स की ज़रूरत है जब मैं बताती हूं कि बस एक आवाज़ भर है जो मुझे अरसे से उलझाये हुये है.

एक आवाज़...जिससे आज कल मेरा इश्क़ परवान चढ रहा है.

Wednesday, February 29, 2012

इश्क़ जैसा कुछ


दिसम्बर की कोई तारीख, साल नामालूम


कई बार सोचती हूं कि तुम कोई मौसम, कोई साल होते तो कैलेण्डर का एक पन्न भर पलट कर मैं तुम्हें पीछे छोड कर कहीं आगे बढ जाती. तुम्हें पकडे रखने की... बांध कर जकडे रखने की कोई कोशिश कभी कामयाब नहीं होती और मुझे तुमसे 'इश्क़ जैसा कुछ' हो जाने के भ्रम (या डर) से छुटकारा मिल जाता.
अजीब है ना कि अच्छी तरह जानते हुये कि प्यार जैसा कुछ नहीं होत, मुझे अक्सर लगता है कि मैं तुम्हारे प्यार में पड गई हूं.



२1 फरवरी,साल नामालूम

जो दुपट्टा तुमसे अपनी आखिरी मुलाकात के वक्त मैंने पहना था, वो उस रोज़ आखिरी बार तहों की बेडियों से आज़ाद हुआ था. उसे दोबारा पहनने की हिम्मत नहीं हुई. जाने क्यूं हर बार उसे देख कर ऐसा ख़याल कहां से आ जाता कि इस बार जाने कौन अज़ीज़ हमेशा के लिये रूठ कर चला जाये.
फिर उस कुर्ते पर तुम्हारी बातों के छींटे भी तो पडे हैं, सब कुछ खो कर उन छींटों से भी हाथ धोना मैं बर्दाश्त नहीं कर सकती. जो कुछ तुमने दिया था, वो सब तो जला दिया, मिटा दिया... बस ये एक छाया भर रह गई है जो तब भी मेरे साथ रहती है जब खुद मेरा साया तक ढूंढे से नहीं मिलता. हर रोज़ इसे निकालती हूं, तुम्हारी बातों की खुश्बू को सांसों में भर कर हर लफ़्ज़ को छूती हूं... खुद से रोज़ नफरत करती हूं इसे सहेजे रखने के लिए मगर तुमसे मेरा लगाव, तुम्हारी उलझी बातों से मेरा प्यार एक दिन के लिए भी कम नहीं होता. ये मर सकता है कभी, इसकी तो उम्मीद भी छोड चुकी हूं तो अब दुआ के अल्फाज़ बदल दिये हैं... "अब इसके चंद रोज़ के लिये खो जाने या कि मेरे घर का रास्ता भूल जाने की प्रार्थना करती हूं."

क्या कोई और तरीका है रगों में घुलते 'इश्क़ जैसे कुछ' सि निजात पाने का???



२३ फरवरी,साल नामालूम

जो कुछ तुम कहना चाहते हो, वही सब मैं सुनना भी चाहती हूं और तुम्हारे बिना बोले उसे तुम्हारी तेज़ होती सांसों में सुन भी लेती हूं मगर वही सब जब आवाज़ में तब्दील हो कर कानों से टकराता है तो जाने कैसे अपना असर खो देता है!
अब तक इतनी बातें तो तुमसे कर ही चुकी हूं कि तुम्हारी चुप्पी से ग़म चुन सकूं या कि तुम्हारी हंसी में झूठ की मिलावट को पहचान लूं... लेकिन तुम्हारी बातें और... और... और...सुनने कि लालसा है कि खत्म ही नहीं होती. ये भी सोचती हूं कि तुमसे यूं ही ऊल-जुलूल जो जी चाहे बोलती रहती हूं, जब तुम ऊब जाओगे मेरी बातों से तो अपनी कमअक्ली के किस्से किसे सुनाऊंगी?
पता है.. उस रोज़ जब तुमने कहा कि "तुम बच्ची नहीं हो, बहुत बडी हो" तब मैंने सुना कि "तुम मीलों दूर से भी मेरी उदासी को जज़्ब करने क मद्दा रखती हो." जब तुमने कहा कि "हंसती रहा करो, अच्छी लगती हो" तब लगा जैसे कहा हो कि "ग़म की आंच पर फुहार जैसे पडते हैं तुम्हारी हंसी के छींटे"
सच कहते हो तुम... पागल हूं मैं.. एक दम पागल. फिर भी तुम्हारे 'पागल लडकी' कहने पर मैं इत्ती सारी बकवास बस इसलिये करती हूं कि हमारे बीच कोई सन्नाटा ना पसरे. और फिर जैसा मैं अक्सर कहती हूं, "एक आवाज़ ही तो अच्छी है तुम्हारी" इसे सुनने का मोह छूटता ही नहीं.. यकीन मानो मैं कई बरस तक तुम्हारी बातें (बकवास, to be specific) सुनती रह सकती हूं लेकिन डरती हूं कि कहीं तुम आदत ना बन जाओ मेरी.

तुम्हें तो पता ही है कि मेरे अंदर के अल्हडपन, बेवकूफी.. और सबसे बढ कर मेरी "आवारगी" की मौत का दिन तय हो गया है. उस तारीख के दूसरी पार अगर तुम मुझे याद आ गये तो किसे कहूंगी खुद को संभालने के लिए कि तुम्हारे मिलने के बाद से मैंने खुद को भी कई बातें बताना छोड दिया है.

जानती हूं कि 'खुशफहमी' भर है मगर मुझे सच में लगता ह कि मैं भी कभी तो तुम्हें याद आऊंगी. हां, सच है कि मेरी तरह बातें कोई भी लडकी बना लेगी... तुम्हारी आवाज़ के असर तले बंध कर कोई भी अपनी नींद से समझौता कर लेगी... तुम्हारी उदासी को सोख कर अपनी दुआओं में तुम्हारा नाम बडी आसानी से जोड लेगी... मगर फिर भी जाने मन क्युं ये मानने को तैयार ही नहीं होत कि तुम मुझे सिरे से भूल जाओगे. कुछ तो ऐसा मुझमें भी होगा जिसे तुम याद करोगे... बोलो, याद करोगे ना?
देखो, अगर ना भी सहेजो मुझे अपनी यादों में तो एक झूठ भर बोल देना. तुम कोई संत नहीं हो और मुझे भी झूठ की चाशनी में पगी मीठी बातों से कोई परहेज़ नहीं.

... ज़िन्दगी के उस हिस्से में, जहां मैं तुम्हें अपने साथ नहीं ले जाऊंगी,बडी सारी खुशियां बस मेरे ही इन्तज़ार में बैठी हैं. लेकिन मेरा एक हिस्सा उलझा-सुलझा-सा तुम्हारे पास छूटा जा रहा है. मालूम है मुझे कि इसे संभालने का वक्त नहीं है तुम्हारे पास तो इसका मरना भी मेरी "आवारगी" की मौत के साथ तय है. बस ये एक आखिरी कडी है मेरे-तुम्हारे बीच की... इन दोनों के साथ ही ये सब खत्म हो जायेगा जो सांसों को कसता रहता है... जो हंसी को फूटने नहीं देता... जो खुशियों की बारिश और मेरे बीच अनचाही छतरी सा तना रहता है.

लेकिन मुझे लगता है कि इस जुडने... टूटने.. बिखरने के खेल में कई सालों तक अविरल बहने वाले आंसुओं के झरने फूटेंगे जो दिन-रात उसे सींचते रहेंगे जिसे मैं "इश्क़ जैसा कुछ" कहती हूं.

जाने कितने जनमों के फेर में पिसने के बाद, जाने कितने नरक भोगने के बाद मुझे इस सब से निजात मिलेगी कि जो एक ही वक्त में हंसाना-रुलाना दोनों जानता है.. कि जिसे मैं "इश्क़ जैसा कुछ" कहती हूं.



२5 फरवरी,साल नामालूम

तुम्हारे दिमाग में रहने तक, लाख कोशिश कर लूं, कुछ और लिखा ही नहीं जा सकता. क्या तो होता ही है... एक craving-सी, सही शब्द नहीं मिलता उसके लिये.

एक घुटन-सी होती है जैसे किसी ने दिल को मुट्ठी में भींच लिया हो... तुमसे बात करने की बडी शिद्दत के साथ ज़रूरत महसूस होने लगती है. अकेले बैठ कर बार-बार उन शब्दों को दोहराती हूं जिनके बारे में तुम कहते हो कि मेरी आवाज़ उनमें एक कशिश भर देती है फिर कोई बताता है कि झूठी तारीफें करने मे डॉक्टरेट मिली हुई है तुम्हें.

जानते हो हमारे पिछले conversation में से कौन-सी बात बेतरह याद आती है?
यही की तुमने कहा था कि, "हम कुछ भी ऐसा नहीं करना चाहते जो 'तुम्हें' अच्छा ना लगे"

ऐसा कुछ (झूठ ही सही) कहने वाले से अगर मुझे "इश्क़ जैसा कुछ" (कुछ पलों के लिये ही सही) हो जाये तो रामजी हमें माफ नहीं कर देंगे क्या???

Saturday, January 7, 2012

...तू कहीं भी नहीं


तेरी बातों को हवा में उडा देने की फितरत भी मेरी थी
उन्हीं बातों को हवा से छीन लाने की आदत भी मेरी है

तेरी ज़िन्दगी का हिस्सा बनने को रब से मिन्नत भी मेरी थी
तेरी यादों के भंवर से उबरने को धागों में मन्नत भी मेरी है

तेरे दिल में अपने लिये मुहब्बत की चाहत भी मेरी थी
तेरे ज़ेहन में खुद के लिये नफरत की हसरत भी मेरी है

तेरे ख़यालों तक को मार डालने की साजिश भी मेरी थी
तुझे ख़यालों में जिलाये रखने की ख्वाहिश भी मेरी है

इश्क़ की दीवारों से घिरी, सिर पटकती वो मूरत भी मेरी थी
ऊंचे किले के दरवाज़ों पर लिखी ये इबादत भी मेरी है

हूं 'मैं ही मैं' हर तरफ...
तेरा नाम-ओ-निशां तक नहीं

फिर भी खुद की तलाश का हर रास्ता ग़र तेरी गली से गुज़रे
तो.. अच्छी या बुरी, जैसी भी सही...

कल की ये हक़ीकत भी मेरी थी,
आज की ये किस्मत भी मेरी है...

Friday, November 18, 2011

तुम्हारे ख़यालों के झूले पर मेरी सोच की पींगें...


मातम मनाऊं कि तुम्हें ना मेरी फिक्र, न ज़रूरत, ना चाहत या कि फ़ख्र करूं कि कुछ लम्हों को ही सही मगर तुमने मुझे टूट कर चाहा था और मैं मुतमईन हूं ये सोच कर कि उन चंद लम्हों में मेरे सिवा किसी का ख़याल तक नहीं आया था तुम्हें...

एक और शाम अपनी उदासी और तुम्हारी याद की date plan करने में बर्बाद कर दूं कि अब वो पल तुम्हें एक पल को भी याद नहीं आते या कि बगिया की चिडिया को उससे भी ज़्यादा चहक कर बताऊं कि कल रात तुम्हारा sms आया था. माने कि तुम मुझे नहीं भूले, बस वो लम्हे मिटा दिये हैं अपनी memory से...

चिढ कर, सबसे झगड कर खुद को कमरे में बंद कर के ये सोचूं कि क्यूं तुम मुझे इतना नासमझ समझते हो कि कभी कोई हंसी या कोई आंसू साझा नहीं करते या कि तुम्हारी लिखी इस बात का printout बिस्तर की सामने वाली दीवर पर चस्पा कर दूं कि; "ऐसा सोचते हुये तुम अकेली नहीं होतीं" जाने ये कहते हुये तुमने मेरी कौन सी सोच के बारे में सोचा होगा!!! ये सोच कर ही मैं मुस्कुरा देती हूं.

क्या करूं और क्या ना करूं जैसे कितने ही असमंजसों के बीच झूलती मैं जाने कौन-कौन से काम निबटाये जा रही हूं.और देखो तो... ये क्या किया मैं ने अपनी बेख़याली में...

तुम्हारी image पर छाई गर्द मैंने अपने उजले दुपट्टे से साफ कर दी है. तुम्हारे लिए ऐसा करने को मेरा भविष्य किस निगाह से देखेगा ये तो नहीं पता मगर मेरे-तुम्हारे अतीत से मेरे 'वर्तमान' ने कभी नफरत नहीं की है... जानते हो ना तुम???

Saturday, November 5, 2011

ख़त जो बस काग़ज़ों ने पढा...


पता नहीं ऐसा सबके साथ होता है या नहीं मगर मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है, किसी किसी दिन मन एक अजीब किस्म के अवसाद से भर जाता है.ज़्यादा खीझ शायद इसलिये होती है क्योंकि इस उदासी.. इस अवसाद का दोष किसी पर मढा नहीं जा सकता सिवाय प्रेमचंद की किसी कहानी या जगजीत सिंह जैसे गायक के लिए श्रद्धांजलि स्वरूप लिखे गये, अखबार में छपे, उन articles को जिन्हें पढ कर समझना मुश्किल होता है कि लिखने वाले ने इन्हें किसी को श्रद्धांजलि देने के लिये लिखा है या स्वयं के महिमा मण्डन के लिये.

मगर अपने अवसाद का दोष उन दुखांत कहानियों या भारी ग़ज़लों को देने से कोई फायदा नहीं होता. प्रत्युत्तर में ये ग़ज़लें या कहानियां आपसे झगडा नहीं करतीं और क्योंकि किसी तरह की बहस नहीं होती इसलिये ध्यान भी भटकने नहीं पाता.

ऐसे ही किसी दिन में अपने किसी बेहद करीबी से ये सब कह देने का मन होता है मगर फिर एक एक कर के सबके नामों पर गौर करने के बाद आपको अहसास होता है कि आप बेहद practical लोगों से घिरे हुये हैं और कुछ भी कहने से पहले आपको अपनी उदासी की वज़ह बतानी होगी जो यक़ीनन आपके लिये भी नितांत अजनबी है.

और तब मुझे "तुम" याद आते हो. हां, तुम... बताया तो तुम्हें किसी और के सामने मैं बेवकूफ नहीं बन सकती, सबने मुझे 'समझदार' का तमगा दिया हुआ है और मेरी निहायत बेवकूफाना बातें मेरे समझदार होने के भ्रम के साथ साथ उनके इस भरोसे को भी तोड देंगी कि मैं उनकी उलझनें सुलझा सकती हूं. मगर तुम्हारे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं, मैंने पहले दिन से ही तुम्हें समझदार बता कर खुद को बेवकूफ कहलवा लिया है.

कुछ भी तो नहीं जानती तुम्हारे बारे में मगर फिर भी ना जाने क्यूं ऐसी उदास शामों में तुम्हारी बातों के रंग घुले दिखते हैं. मगर पांच रोज़ पहले ही मैंने एक बार फिर खुद को तुम्हारे असर से आज़ाद कराने का वायदा किया है. ritual of 21 days जैसी किताबी बातों को भी अमल में लाने की कोशिश कर रही हूं.

तुमसे दूर रहने का हर संभव प्रयास कर रही हूं. तुम्हें call या message करने से खुद को रोकने के लिए ritual of 21 days का wallpaper चस्पा कर रखा है. अन्तर्जाल से यथासंभव दूरी बनाये हुये हू मगर लगता है मानो फिर से कायनात कोई साजिश रच रही है. हर तरफ दीवारें खडी करने के बाद जब मैं सुकून की सांस ले कर अखबार उठाती हूं तो आज वहां भी तुम्हारा नाम झांक रहा है. आधे घण्टे तक फिज़ूल खबरें पढने की नाकाम कोशिश करती हूं मगर हर २-४ मिनट में तुम्हारी (या तुम्हारे हमनाम किसी शख्स की) लिखी वो २ पंक्तियां पढ लेती हूं जो जगजीत सिंह को श्रद्धांजलि देने के लिये छापी गई हैं...

हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोडा करते
वक्त की शाख से पत्ते नहीं तोडा करते

जाने क्यूं इन २ पंक्तियों में खुद को ढूंढना चाहती हूं. जाने कौन नासमझ ये सुनना चाहता है कि ये तुम्हारी आवाज़ है.. मेरे लिये. ख़ैर, मैं उस नासमझ को इसी ग़ज़ल का दूसरा मिसरा सुना कर समझा लूंगी...

शहद जीने को मिला करता है थोडा थोडा
जाने वलों के लिए दिल नहीं तोडा करते

कभी कभी सोचती हूं कि अपने बचपने भरी ज़िद को थोडा परे सरका पाती तो ये सब तुमसे कह सकती थी मगर मेरी expectations (जो करने का यक़ीनन मुझे कोई हक़ नहीं) मेरे ego को हवा देती जाती हैं और जाने कितना कुछ मेरे अंदर ही अंदर जल जाता है. और तब मुझे अपने आलस को परे धकेल कर diary-pen उठाना पडता है. ये पन्ने मेरे अवसाद को जज़्ब कर पाने की ग़ज़ब की काबिलियत रखते हैं, एक अजीब सी संतुष्टि देते हैं. मानो मैं इनकी महबूबा हूं और मेरा हर दुख, हर आंसू,हर हंसी, हर खुशी ये सहेज लेना चाहते हों. शायद इसीलिये जब सब मेरी उदासी से हार जाते हैं तो मैं कलम के हाथों एक ख़त इन काग़ज़ों के नाम भेज दिया करती हूं.ये काग़ज़ स्याही बन कर बहने वाली मेरी सारी उदासी को सोख लेते हैं.

इन पन्नों में किसी किस्म की insecurity भी नहीं. शायद इनकी मुझमें incredible faith है कि मैं लौट कर इनके पास ज़रूर आऊंगी या शायद दुनिया क तजुर्बा बहुत है और ये जानते हैं कि मैं फिर फिर लौटा दी जाऊंगी.. लोग कभी ना कभी मुझसे थक कर मुंह फेर लेंगे और ऐसा ना होने तक ये मेरा इंतज़ार करते हैं.

तुम्हारी कई लाख पलों तक बाट जोहने के बाद भी जब तुम नहीं आते तो मैं तुम्हारी और तुम्हारे जैसे हर शख्स की बुराइयां इन पन्नों से करती हूं जिन्होंने मुझे hold पर रखा हुआ है.

और आखिर हूं तो लडकी ही.. बुराइयां, निन्दा करने के बाद अवसाद भले ना मरे मगर तुम्हारी याद की शिद्दत में एक कमी-सी आ जाती है.

हर सवाल का जवाब मिलता है सिवाय इस बात के कि ढेर सारे दोस्तों और कई अजनबियों में से बस "तुम".. एक तुम ही क्यूं याद आते हो??? शायद इस्लिये क्योंकि तुम्हें चीज़ों की वज़ह नहीं देनी होती.मेरी फिजूल-सी किसी बात के बाद तुम्हारे मन में एक 'क्यों' नहीं उगता.

जैसे उस रात मेरी गहराइयों में उतरने के बाद जब तुमने कहा था कि, "तुम्हारी आंखें बहुत बोलती हैं, बहुत खूबसूरत हैं.. ठीक तुम्हारी उंगलियों की ही तरह"
और तब हमने ताक़ीद की थी कि हमारी करीबी के इन पलों में हमारी तारीफ मत किया करो.
ऐसी कितनी ही बातें सिर्फ इसलिये कह पाये क्योंकि यकीन था कि तुम पलट कर कोई सवाल नहीं करोगे.

ख़ैर...

Wednesday, October 19, 2011

... या ये मेरा भरम ही है!!!


कहीं पढा था कि स्रष्टि में केवल एक ही चीज़ शाश्वत है और वो है.. परिवर्तन; तो ज़ाहिर है कि चीज़ें और लोग आज से पहले भी बदलते रहे होंगे.. सम्भव है कि मुझमें भी हर बीतते दिन के साथ किसी नये परिवर्तन ने घर किया होगा. फिर ऐसा क्यूं लगता है कि बस पिछले छः महीनों में ही समय का चक्का पहली बार घूमा है? क्यूं ऐसा लगता है कि मेरे जन्म से ले कर मेरे २४ साला होने तक सब कुछ ठहरा हुआ था और अब अचानक वो सब, जिसकी मैं आदि थी, मानो गायब ही हो गया है.

और ऐसा नहीं है कि सिर्फ लोग और हालात ही बदले हों.
मैं.. मैं खुद भी इतनी बदल गई हूं कि आईने में अपनी आंखों में झांकते हुये जाने किसकी नज़र इतने गहरे तक भेद जाती है कि निगाह चुरानी पडती है.

जाने कितने ही भरम थे खुद अपने बारे में जो धीरे-धीरे किसी ग्लेशियर की तरह पिघल रहे हैं. इतने धीरे कि किसी का ध्यान तक नहीं जाता.. मेरा भी तो कहां ही गया था तब तक कि जब तक वो लकीर नहीं पिघल गई जिसे मैं अपनी हद कहती थी.

हां, हद ही तो थी जो मैंने खुद अपने लिये तय की थी. हद ही तो थी जो बरसों से खींचती थी अपनी तरफ.. लुभाती थी उस पार की दुनिया दिखा कर. मगर मैं अपने डर (जिन्हें तब मैं अपने उसूल समझती थी) के पहरेदारों की फटकार सुन कर कभी उस तरफ का रुख नहीं करती थी.

लेकिन क्योंकि परिवर्तन शाश्वत है इसलिये बांधा तो किसी को भी नहीं जा सकता. मैं भी एक दिन उन पहरेदारों की नज़र बचा कर निकल आई अपनी हद के इस पार की अजनबी दुनिया में. मगर पूरा का पूरा उस हद को कहां पार कर पाई? उस कंटीली बाड में मेरे वजूद का एक हिस्सा उलझ कर रह गया है.

अब मैं अधूरी सी बस एक प्रवाह के साथ बही जा रही हूं. सोचना... कोशिशें करना... खुद को बांधना.. मैंने छोड दिया है.

जाने मैं जी रही हूं या ये मेरा भ्रम ही है उस मोमबत्ती के जैसे जो अपनी रौशनी, अपनी लौ पर इतरा रही है बिना ये जाने कि वो धीरे-धीरे अपनी म्रत्यु की तरफ.. एक अंधकार की तरफ बढ रही है.

सच में, कौन ही जाने कि मैं जी भी रही हूं या ये मेरा भरम ही है!!!