Friday, March 27, 2009

maa

"मा"...
ना जाने कितने लबो से रोझ यह शब्द निकलता होगा
तुम्हारे सामने भी इसे देख कर कोइ आकार उभरता होगा
माथे की गोल लाल बिन्दी के साथ कोई रुप सन्वरता होगा
मेरे सामने भी उनकी तस्वीर कुछ यू उभर आती है
मानो पानी मे अपनी ही परछाई नजर आती है
जानते हो कैसी है वो?
जानना चाहोगे कैसी है वो?
मेरे घर के हर काम से कुछ ऐसे जुड़ी है
मानो हर चीज का आधार वो, हर चीज की धुरी है
चेहरे पर ऐसी शान्ति नजर आती है कि देखते ही हर परेशानी उड़न छू हो जाती है
सन्यम और धैर्य की साकार प्रतिमूर्ति है वो
कुछ् यू उन्होने मेरी हर गल्ती को स्वीकार किया
मानो कोई कमी उनकी ही रही, उन्होने ही कुछ गलत किया
यू पाला है मुझको मानो कोई चित्रकारा रन्ग सजाती है
फिर भी जैसे अपनी कला से असन्तुष्ट हो
उसकी तूलिका प्रति पल चल्ती जाती है
रोज किसी नयी कमी को ढूढ कर उसे सुधारती है
नियम कायदे का ऋगार कर प्यार से सन्वारती है
अपनी कला को निखारती है
गर वो ये पढेगी तो की शब्द न चुप्पी तोडेगा
नैनो से ही भव झरेगे, वात्सल्य क झरना फूटेगा
त्तो ये शब्द तो उनसे दूर रहेगे, न कोई और कहेगा और ना हम कहेगे
मन की ये बात जताना बताना हमारे वश की बात नही
गर चाहे भी तो लब देगे साथ नही

4 comments:

  1. मेरे घर के हर काम से कुछ ऐसे जुड़ी है
    मानो हर चीज का आधार वो, हर चीज की धुरी है
    चेहरे पर ऐसी शान्ति नजर आती है कि देखते ही हर परेशानी उड़न छू हो जाती है
    सन्यम और धैर्य की साकार प्रतिमूर्ति है वो
    Monali,
    ma ke liye bahut sundar aur sarthak panktiyan likhi hain apne.apke anya kavitayen bhee padh lee mainen.achchha prayas kar rahee hain.bahut bahut shubhkamnayen aur badhai.mere blog par aaiye ,apka svagat hai.
    Poonam

    ReplyDelete
  2. really u r doing a great job. plz keep up this spirit ever n ever. all the best for future. and really these are fantastic.

    ReplyDelete