Thursday, January 29, 2015

नये बहाने लिखने के...

तन की सरहदों के दायरे में ही एक गांव बसाया था। कोख की मिट्टी में मासूमियत रोपी थी और सोचा था कि इक रोज़ किलकारियों की फसल महकेगी। चाहा था कि उन किलकारियों को पिरो कर एक खूबसूरत बन्दनवार तैयार करूंगी और अांगन के ठीक. सामने वाले दरवाज़े पर टांग दूंगी। उसमें लटकानी थी मुझे नन्ही नन्हीं लोरियों की घण्टियां कि जिन्हें आते जाते हल्का सा हिला दूंगी और उन सुरों से भर जाएगा सारा खालीपन।

तुम्हारे  गालों के गड्ढे  में भर कर मेरी हंसी कैसी लगेगी, ये भी देखना था। मेरी बेवकूफियों से लिपट कर तुम्हारी समझदारी की बेल कितना ऊपर जायेगी, ये भी जानना था।

मैंने उस फसल को हर खाद मुहैया  कराई थी लेकिन मां के लाख समझाने  पर भी नींबू मिरची नहीं टांगा था।
खैर ... ये भी होना था कि मैं ही कब से कहती आ रही थी कि लिखने का कोई बहाना नहीं मिलता।

नन्हीं  मासूम मुस्कुराहटों से उठते किसी भंवर में
अपनी तमाम उलझनें फेंक आने के ख्वाब थे
तेरे-मेरे बीच आ कर भी पाट दे हर दूरी
ऐसी कारीगरी  के नमूने वाले पुल बनाने के ख्वाब थे
खाली सपाट दीवारों पर चस्पा तस्वीरें मज़ा नहीं  देतीं
काली पेन्सिलों वाली कलाकारी सजाने के ख्वाब थे

ख्वाब थे ...
छोटे ऊनी मोज़े बुनना सीखने के,
ख्वाब थे ...
अनन्त तक भर कर, निर्वात तक रीतने के
ख्वाब थे ...
दर्द की लहरों भरे दिन, हंसाते हुए बीतने के
ख्वाब थे ...
 
रच कर स्वयम् कुछ, पकृति को जीतने के
लेकिन क्योंकि ख्वाब बस करवट बदलते ही टूट जाते हैं
इसलिये इस बार हकीकतों को पालूंगी।
नहीं फेरूंगी हाथ प्यार से खुद पर,
इस बार तुझे अपनी नज़र से बचा लूंगी

Friday, January 16, 2015

पापा!!!




पिता...
सबृ और सख्ती को घोल कर
 पिला देना चाहता है

पिता...
डांट और नरमी को मिला कर
पहना देना चाहता है

पिता...
फिकर और गुस्से को बुन कर
ओढा देना चाहता है

पिता...
प्यार और चिन्ता को फेंट कर
चटा देना चाहता है

पिता...
भरोसे और नज़र अंदाज़ी को छौंक कर
खिला देना चाहता है

पिता...
सीख और चोट से रगङ कर
चमका देना चाहता है

पिता...
मरहम और तीखे शब्दों से घिस कर
संवार देना चाहता है

पिता...
गोद और फटकार में पिरो कर
सजा देना चाहता है

पिता केवल पिता नहीं, वो मां भी है
पिता... सबृ है संयम भी
           ज़ख्म है मरहम भी
           अात्मा है तन-मन भी
           हंसी है अनबन भी

पिता...
सङकों पर छोङ देता है
...कि तुम रास्ते ढूंढ पाओ

पिता...
मुंह पर दरवाज़ा फेर देता है
...की तुम घर बना पाओ

पिता...
चौखटों में जकङ देता है
...कि तुम अपनी ज़िद की कीमत समझ पाओ

पिता...
तुम्हारी कमियों को उघाङ देता है
... कि तुम कहीं अधूरे ना रह जाओ

पिता...
तीखे शब्दों से छील देता है
... कि तुम जिंदगी की हर चोट से उभर पाओ

पिता है तो तुम हो
खेल है खिलौने हैं
सुरक्षा है सपने हैं
पिता मां जितने ही अपने हैं

Wednesday, November 19, 2014

साढे बारह घण्टे...

तमाम शाम सोचा कि फकत एक रात की बात है
फिर सुबह मुझे  भी चल देना है इक राह पकङ कर
हिसाब लगाया घण्टों-मिनटों और निबटाने को पङे तमाम कामों का
ठीक बारह घण्टे और तीस मिनट बिताने थे तुम्हारे बिना इस घर में

जो मुझे बता गये कि वक्त फकत घङी की सुइयों का खेल नहीं है...

वक्त वो तोहफा है जिसे तुम घर लौटते हुए डाल लाते हो जेब में
वक्त वो मरहम है जिसे तुम हताशा वाले दिनों में मल देते हो मेरे माथे पर
वक्त वो जज़्बा है जिसे मेरे गिर्द लपेट देते हो तुम ठण्डी रातों में
वक्त वो गोटी है जिसे कैरम के इस बोर्ड पर बिखेर देते हो तुम बोझिल शामों में


और...
बक्त वो बोझ भी है जिसे उठाए फिलवक्त मेरी पीठ दुख चुकी है
वक्त वो उङी हुई नींद भी है जो रेंग रही है मेरी उंगलियों में

वक्त मेरा और तुम्हारा साझा खाता है...
जो अकेले संभाले नहीं संभलता...

Wednesday, February 5, 2014

वो जो हममें तुममें क़रार था... तुम्हें याद हो कि ना याद हो




नहीं... मुझे इस दर्द की काट नहीं चाहिये. कोई दवा ग़र पा भी लो तो छुपा लेना मुझसे.
... कि इन ज़ख़्मों से उठता जिस्मानी दर्द मुझे तमाम रूहानी तकलीफों से आज़ाद करता है. जब ये दर्द रगों में बहता है तो मुझे ज़िन्दा होने का अहसास होता है. बदन का दर्द दुनिया जहान की उलझनों से ध्यान हटा देता है. पोर-पोर उठती तपकन पर अपना सारा चित्त एकाग्र कर लेना चाहती हूं लेकिन हवा में बहती हुई कोई आवाज़ आ रही है...

"वो मेरे हैं... मुझे मिल जायेंगे... आ जायेंगे
..ऐसे बेकार के ख़यालात ने दिल तोड दिया है"

कैसी भारी और गहरी आवाज़ है.. बेचैन सी कर देने वाली. रात भारी होती जा रही है.

यूं तो दिन में भी लगता है जैसे गले पर कोई बोझ सा है, सांस लेना मुश्किल होता जाता है. लेकिन रात... रात के अंधेरे में, जब सिर्फ कल्पनायें ही दृश्य़ होती हैं, मैं जैसे देख पाती हूं उस साये को जो आंखों में प्यार के डोरे और भवों में नफरत के फन्दे डाले मेरे गले पर अपने अंगूठे का दवाब बढाता चला जा रहा है... उसका चेहरा कितना मिलता है तुमसे.

मैं जाने किस सम्मोहन तले उसे परे हटाने की कोशिश नहीं करती. तब तक तो नहीं जब तक मेरा जिस्म अगली सांस के लिए बग़ावत नहीं कर बैठता.

हाथों में जाने कौन आ बैठता है और उसे परे धकेल देता है. मैं हडबडा कर उठ जाती हूं... हाथ-पैर फेंकती हूं "उसे" ढूंढने-टटोलने के लिए.
... कि मैं अपने क़ातिल को बांहों में भर कर चूम लेना चाहती हूं, जो मेरा सारा बोझ अपने हिस्से लिखा कर मुझे मौत की खुली आज़ाद दुनिया बख़्शना चाहता है... जो मेरी आज़ादी के एवज़ में ज़िन्दगी की ग़ुलामी ताउम्र करने को तैयार है.

मैं शायद चीख रही थी कि तुम हडबडाये से मेरे कमरे में आ गये हो.. सब रौशन कर दिया है तुमने लेकिन मुझे जिसकी बेतरह तलब है इस वक़्त वो जाने कहां गायब हो गया है. मैं तुम्हारे लिए नफरत से इस कदर भर चुकी हूं कि छलकने को हूं.

नफरत करती हूं मैं तुमसे.. घृणा है मुझे इन उजालों से...

... कि मेरा इश्क़ बस अंधेरों में ज़िन्दा होता है.
...कि तुम रौशनी में बडे दूर हुए मालूम होते हो.
...कि उजाले मेरी सौत हैं.

.. कि मैं इक रोज़ मर जाने की आस पर ही ज़िन्दा हूं.


Monday, January 27, 2014

तुझसे बंधी... तुझमें बसी...

वो अलसुबह तुम्हारा चेहरा देख कर दिन शुरु करना
सब्जी चलाते हुए, आटा गूंथते हुए...
... एक सरसरी निगाह घडी पर डालते रहना
झुंझलाना इस बात पर कि क्यूं कभी तुम्हें तौलिया नहीं मिलता?
तुम्हारी मंथर गति देख कर बिगडना...
नाश्ता खत्म करने को बहलाना...
बच्चों की तरह खाने का डिब्बा पकडाना और,
मफलर ढंग से लपेटने की ताकीद करना
"सुबह सुबह गोकि मैं तुम्हारी मां हो जाती हूं "


फिर दोपहर भर सोचना ये फिज़ूल सी बातें
लिखना तुम्हें वो बेतुकी चिट्ठियां ...
.. और उन्हें अपने सिरहाने की किताब में सुला देना.
पढना वो ख़त तुम्हारे,
कि जिन पर तहों के निशां तले अल्फाज़ धुंधला से गये हैं
कभी मुस्कुरा देना किसी ख़याल पर
और कभी झूठमूठ ही हो जाना नाराज़ किसी बेतुकी सी बात पर..
"तपती दुपहरों में मेरे अंदर अलसाई पडी,
तुम्हारी प्रेमिका अंगडाईयां लेती है."

शाम में खंगालना साग-भाजी की डलिया
बीनना पसंद तुम्हारी और छौंक देना ठीक वैसे जैसे भाये तुम्हें
एक-एक फूली रोटी तुम्हें खाते हुए तकना
और उन कडी जली चपातियों को अपने लिये रखना
ह्ंसना, ठिठोली करना, छीनना-झपटना, भागना-पकडना...
... तब कि जब दिन तुम्हारा अच्छा ग़ुज़रा हो
या फिर चुपचाप बदलना टी.वी. के चैनल कि तुम पर थकान तारी है.
"दिन ढलते-ढलते जागने लगती है तुम्हारी अर्धांगिनी मुझमें"

Monday, September 30, 2013

...बिखरे बिखरे ख़याल!!!

अकेले सूने घर में बर्तन धोते-धोते अचानक कटोरी को पटिया पर फेंक कर खडी हो जाती है, सलवार झाडने लगती है. कुछ भी तो नहीं है.. लगा जैसे कुछ रेंग रह हो अंदर. चूहे, छिपकली, कांतर सभी कुछ तो है इस मकान में और परले साल तो एक संपोला भी निकल आया था उपलों वाली कुठरिया में.

"तू कब से डरने लगी?"
"जब से अकेले रहने लगी."
"ह्म्म्म् अब तो रघु भी नहीं है यहां"
"था भी तब भी कहां ही था.. तब भी अकेली ही थी जब पलंग पर उसके पांव दबाते दबाते नींद से जूझती रहती थी."

क्या ऊल-जुलूल सोचे पडी है. अकेले रहते रहते शायद दिमाग कुछ चल गया है वरना कोई यूं खुद से ही बात करता है. ग़र खुद ही जवाब देना हो तो फिर सवाल रहा ही कहां?

लेकिन बात है तो सही.. ये डर सचमुच अकेलेपन से ही उपजा है. अम्मा के घर में तो कभी नहीं लगा डर.. सांप, बिच्छू, छिपकली तो वहां भी थे मगर भरोसा सा था कि कोई बचा लेगा और ना भी बचा पाये तो कितने ही ढेर सारे लोग होंगे जो घेर कर आंसू बहायेंगे.

ये भी कैसा अजीब सा सुकून है कि आपके मर जाने पर कितने लोग रोएंगे जबकि कोई रोए या ना भी रोए, कौन सा कुछ पता चलना है मौत के बाद. लेकिन फिर भी एक सुकून है.. नहीं, सुकून 'था'. अब तो मर जाना भी डरावना लगने लगा है. और बीमार या चोटिल हो जाना.. बेतरह भयानक.

जाने कितने ही दिन बुखार में तपेगी, भूख से आंतें इठीं जाती होंगी मगर खाना पकाने की ताकत नहीं होगी.
कभी आंगन में पैर फिसल जायेगा, मोरी की ईंट माथे में घुस जायेगी..खूब खूब खून बह जायेगा मगर उठ जाने की हिम्मत नही होगी.

और ऐसे ही कभी बुखार में तपते या वहीं मोरी के पास औंधे मुंह पडे मौत आ जाएगी. कौन बैठा है जो किसी को कुछ मालूम होगा? तो क्या चूहे कुतर डालेंगे देह को... कीडे पड जाएंगे? सडांध फैलना शुरू होगी तब कोई दरवाजा तोड कर कहेगा; "ओहो, मर गयी बेचारी. उंहू.. म्युनिसपैलिटी वालों को खबर करो, कैसी सडांध फैल रही है. फूंकने-फांकने का इंतज़ाम करो."

और फिर वो 'कोई' मुंह पर कपडा रखे रखे ही बहर चला जायेगा. तो क्या इतनी लम्बी छ्ब्बीस साला ज़िन्दगी में एक 'कोई' ही जुटा मेरे हिस्से में? मैंने तो भरे-पूरे कुनबे के सपने सजाये थे. दादी सास लाड लडाएगी... सास चिढ कर कम दहेज का ताना देगी, मैं भी शुरु के कुछ साल सुनूंगी फिर उल्टे जवाब देना सीख जाऊंगी. ननद मेरा सामान बांटेगी, मैं बस कुढ कर रह जाऊंगी. देवर ठिठोली करेगा... "अपने भतीजे-भतीजियों को बिगाडे दे रहे हो तुम, लल्ला जी" ऐसा ताना दूंगी मैं. और एक "तू" होगा जो आते-जाते कोई इशारा कर देगा और मैं घूंघट को और आगे खींच कर ओट में ही शर्म से दुहरी हो जाऊंगी.

लेकिन तू तो यूं ही बीच में धोखा दे कर चला गया. क्या इसी दिन को मैं सब आगा-पीछा भूल कर तेरे संग चली आई थी? क्या हक़ था तुझे ऐसे मझधार में मुझे छोड जाने का?

तेरे तो सब कर्मकाण्ड मैंने किसी तरह निबटा डाले लेकिन मेरा अंतिम संस्कार किसके भरोसे छोड कर चल दिया तू? कहते हैं सब सही से ना हो तो आत्मा भटकती है.. जीते जी जो भटक रही हूं, क्या मरने के बाद भी मेरे हिस्से चैन नहीं आना है?


कुछ तो छोड कर जाता मरे. कोई आस, कोई औलाद. हां, जानती हूं कि तेरे जैसे लम्पट और मेरे जैसी कुलच्छिनी का जना सपूत तो ना होना था मगर कोई तो होता जिसे कोसने में उमर तमाम होती रहती.

कोई जमीन-जायदाद.. अपनी नहीं, रेहन-गिरवी रखी छोड जाता जिसे छुडाने के नाम पर मैं किसी रोज़ खुद को बेच डालती. कुल्टा हो जाने का "कोई एक बहाना भर" ही छोड जाता रे!

तू तो बस ख़याल छोड गया है. मैं ख़याली पुलाव पकाती ही चली आयी तेरे संग... तेरा ख़याल ही रखती रही इतने बरस और अब भी क्या ही है हाथ में? अतीत के ख़याल ... भविष्य के ख़याल .. जी पाने के ख़याल .. मर जाने के ख़याल.

ख़याल...ख़याल...ख़याल...फक़त ख़याल... 


Thursday, September 12, 2013

"फिक्र की खुराक इश्क का ज़ायका खराब किये दे रही है..."


कोई किसी जाहिल को इतना याद कर सकता है???
जबकि पता हो कि तुम होते भी तो इस वक़्त तक सो गये होते,
इस बात से बेपरवाह कि मैं करवटें बदलती हूं रात सारी...
तुम्हें जगाना चाह कर भी जगा नहीं पाती, हालांकि  मालूम है मुझे कि;
"फिक्र की खुराक इश्क का ज़ायका खराब किये दे रही है..."

कोई किसी जाहिल को इतना याद कर सकता है???
जबकि पता हो कि तुम होते भी तो इस वक़्त तक सो गये होते
तब तुम्हारी उस बेपरवाह नींद को मैं सारी रात खुली आंखों से निहारती,
चाहती उठ जाना और टहलना यूं ही इस सूने, बिना आंगन वाले घर में...
किसी किताब से अपनी मनपसंद पंक्तियां पढ लेने की शदीद इच्छा को दबा देती कि;
कहीं तुम जाग ना जाओ...

कोई किसी जाहिल को इतना याद कर सकता है???
जबकि पता हो कि तुम होते भी तो इस वक़्त तक सो गये होते ...
चिढती, खांसती- खखारती मगर ऐसे कि;
कोई खलल ना पडे तुम्हारी नींद में...
और सोचती कि तुम्हारा होना- ना होना बराबर सा ही है...

मगर जब बिस्तर में तुम्हारी जगह एक निरा निश्चल तकिया भर पडा देखती हूं तो मालूम होता है कि तुम्हारा नींद में करवट भर बदल लेना भी एक सुकून है..
कभी यूं ही कच्ची नींद मे पूछ लेना कि "सोयी नहीं अब तक" और मेरे जवाब का इंतज़ार किये बिना ही फिर करवट बदल कर सो जाना भी एक सुख है...

जब तक खो ना जाये, तब तक निरा अनजाना ही रहता है बहुत कुछ