Friday, July 2, 2010

पाप और पुण्य

कमरे की खामोशी में उनकी आंखों से दर्द बहा करता है
और मैं उसे चुप्चाप पी लिया करती हूं
करते हैं जब सब उनसे अपनेपन की बातें...
झूठे दिखावे के कडवे किस्से और एह्सान के तौर पर जागती रातें...
तभी कोई आंसू ना ढुलक जाये...
इस डर से पलकों के कोर-सी लिया करती हूं

ऐसा भी नही कि बेहद प्यार है हमें उनसे या उनकी कमी बेहद खलेगी
बस ये सच चुभता है कि जाडों में अंगीठी फिर ना जलेगी

मगर इस सब को हटा के परे,
मैं ईश्वर से उनकी मौत की प्रार्थना किया करती हूं
कोंचती सुइयों और ग्लूकोज के सहारे पुण्य बटोरते हैं सभी
और मैं उनकी मौत की दुआ का पाप ओढ लिया करती हूं

Tuesday, June 8, 2010

हम दोनों लडकी हैं


"मां ये काशी सडक पर क्यूं रहती है?"
"क्या पता बिटिया...जाने कौन अभागिन है और भाग्य का कौन सा मज़ाक उसे यहां अनजानों की बस्ती में खींच लाया है?"
"बिरजू काका कह रहे थे कि तुम उसे रोटी देती हो?"
"हां री, जब इतने लोग इस हवेली में मुफ्त की रोटी तोड रहे हैं तो ये पगलिया क्यों नहीं?"
"मां तुम काशी को पगलिया ना कहा करो"
"लो कर लो बात... अब पगलिया को पगलिया ना कहें तो क्या सयानी कहें?"

मां की ये व्यंग्य भरी मुस्कान हमसे सहन नहीं हुई और हम छत पर आ गये. मौसम साफ है, हल्के हल्के बादल हैं मगर बिरजू काका कह रहे थे कि बारिश नहीं होगी अभी. चांद लुकाछिपी का खेल खेल रहा है.बादलों की ओट से झांकता है और तारों को देख कर फिर से छिप जाता है. और काशी...वो भी तो अपनी फटी चुनरी के झरोखों से हमें देखती है और फिर छुप जाती है.

ओहो...ये काशी का फितूर उतर क्यूं नहीं जाता हमारे दिमाग से? कितना अच्छा मौसम है... ऐसे ही बादलों में तो हम और बडे भैया अपनी कहानी के चरित्र गढ़ा करते थे. अब तो बडे भैया भी बडे शहर जा कर हमें याद नहीं करते. बाबूजी की तरह उन्हें भी लगता है कि रानी को बस लत्ते और गुडिया ही चहिये. तो ना करें हमें याद, हमें ही कौन सा उनकी याद आती है और ये खेल तो हम अकेले भी खेल सकते हैं...

वो देखो वो बडा सा राक्षस उस छोटे बच्चे को पत्थर से मारने वाला है...

"रानी बिटिया..अरी ओ रानी बिटिया...जल्दी नीचे आओ. ऊ कमबखत कासी ने स्यामसुन्दर के मौढ़ा को मूढ फोड दओ. जन्दी चल के रोको बा कासी ए..."
"पगला गया है क्या बिरजू. इतनी रात गये रानी कहीं नहीं जायेगी. तेरे मालिक को पता चला तो तेरे साथ साथ मेरी भी टांगें टूट जानी हैं"
"ई पडोस मां तो है ई मलकऐन...बिटिया कूं अभाल संगै लिये आत हैं"
"अरे ये वहां क्या करेगी आखिर और जो उस काशी ने इसे ही पत्त्थर मार दिय तो?"
"नहीं मां, काशी हमें कभी नहीं मारेगी"
"हां मलकएन, रानी बिटिया से तो बडा सनेह मानत है ऊ. हमें तो लागत है के कोई रिस्ता है दोनन का परले जनम का"
"तू पगला गया है बिरजू. जा छत से कपडे उतार और रानी तू भी चुप्चाप सो जा अब"
"और काशी, मां?"
"उसकी चिन्ता तू मत कर.कोई बहन नहीं है वो तेरी"
"मगर है तो वो मेरे जैसी ही..."
"रानी, आज कहा है,आइन्दा मत कहना. उस पगलिया और तुम्हारी क्या समता?"
"मगर मां..."
"चुप...एकदम चुप. सो जा अब."

ये काशी भी न... खुद तो मार खाती है सारे गांव से, हमें भी डांट लगवा दी. और हमारा खेल भी खराब कर दिया. हवा जाने उस बादल को उडा के कहां ले गयी. जैसे काशी का भाग्य उसे यहां ले आया है.

मगर क्या वो हम जैसी नहीं है? फिर मां ने हमें और बिरजू काका को क्यूं डांटा? लगता है कि बाबूजी ने मां को ऊंची ऐढी की चप्पल खरीदने से मना कर दिया होगा, तभी पारा चढा हुआ है और इस काशी के कारण हमारा भी पारा चढ गया है.

"बिरजू काका, आज हम ठण्डा दूध पियेंगे"
"ठीक है बिटिया"
"क्या ठीक है? लाओ ना दूध."
"लो... जे रहौ, तुम्हरे लये ठण्डौ दूध"
"काका, काशी हमरे जैसी है ना?"
"हां बिटिया"
"क्या हां बिटिया? बिना सोचे बस हां में हां मिलाते रहते हो. कैसे है हमारे जैसी?"
"बस है"
"कैसे?"
"उ...ऊ... हां देखो...उसके दुइ हाथ हैं, तुम्हार भी हैं...उसके एक नाक हैम तुम्हारे भी ऐ...दुइ आंख...दुइ पैर.."
"बिरजू..."
"आत हैं मलकऐन..."

मां भी ना... सूची भी पूरी नहीं होने दी. हमें ही बनानी होगी...

१. हम भी स्कूल नहीं जा सकते, वो भी नहीं जा सकती... हम दोनों लडकी हैं
२. हम भी सिर पर पल्लू रखते हैं, वो भी... हम दोनों लडकी हैं
३. हम भी हमेशा बाबूजी के घर नहीं रह सकते, वो भी अपने बाबूजी के घर नहीं रहती... हम दोनों लडकी हैं

मगर मां तो कहती है कि वो पगलिया है. तो क्या एक पागल लडकी और एक सयानी लड्की मे फर्क होता है? शायद हां...

१. हम घर में कैदी है, वो खुली हवा में... हम दोनों लडकी हैं
२. हम सब पा कर रोते है, वो सब खो कर... हम दोनों लडकी हैं
३. हमारी चुनरी सिर से गिरे तो सब डांटते हैं और उसकी गिरे तो सब झांकते हैं... हम दोनों लडकी हैं

मगर ये भेद भी इतने समान से क्यूं लगते है? क्यूं हमें एक पागल और एक सयानी लडकी का फर्क समझ नहीं आता? शायद इसलिये क्योंकि... हम दोनों लडकी हैं.

Monday, May 17, 2010

दिव्य


समन्दर करता है गुमान
विशालता का है अभिमान
सोचता है ना जाने कितनों को देता हुं जीवन दान
ना इस बात से बेखबर, ना इस तथ्य से अनजान कि...
इस विशाल, विस्त्रत जीवनदायी देह का स्वामित्व यूं ही नहीं मिल गया खारे पानी के सागर को
ना जाने कितनी नदियों ने अपना अस्तित्व मिटा के भरा है इस गागर को
खुद को मिटा के, बिना कुछ पाने की आशा के...
भेद सब हटा के, बिना कुछ खोने की निराशा के...
प्रेम के वशीभूत सर्वस्व निछावर किया
पता है कि कुछ हासिल नहीं होग मगर खुद को सौंप दिया
जानती हैं कि निरुद्देश्य, निर्ध्येय होने का ताना ही मिलेगा
खुदी को मिटाने का कोई सिल खुशनुमा नहीं होगा
लेकिन...
वो प्रेम क्या जो गणना करे...
जो प्रीतम को पाने को मंत्रणा करे...
जो त्रष्णा या घ्रणा करे...

ये प्रेम तो बस खुद को मिटाना जानता है...
सब कुछ लुटा के किसी को हंसाना जानता है...
सरिता का ये प्रेम्, सागर और सूर्यकिरण के मिलन पर भी ईर्ष्या नहीं करेगा...
क्योंकि ये प्रीतम की हंसी में मुस्कुराना जानता है

Tuesday, May 11, 2010

पराजित


मैं अंधेरे में ना जाने किस से समर किया करती हूं
मैं कुछ अपनों और कुछ परायों की मौत हर रोज़ जिया करती हूं

हासिल नहीं इस ज़द्दोज़हद से कुछ भी,
फिर भी जाने क्यूं ज़िद किया करती हूं?

समझाते हैं सभी कि,
ग़र मेरा है तो कहीं जा नहीं सकत और
ग़र पराया है तो मुझे पा नहीं सकता

मग़र मैं उसे पाने को 'रब से मन्नत' औ 'ज़माने से मिन्नतें' किया करती हूं
मैं कुछ अपनों और कुछ परायों की मौत हर रोज़ जिया करती हूं

Friday, February 5, 2010

पगलिया उवाच्!!!


पिया तोरा जादू मोरे सिर चढ बोले
तोरी बातें सुन मन इत उत डोले
ना सूझे मोहे का है सच और का है झूठ
जो तू कहे सूरज में नाहीं गरमी तो सूरज से जाऊं रूठ

हंसती हैं मोपे सखी सहेली सारी
मोहे छेडें, सतावे और खावें मोरी गाली
पिया इनकी नजर में तू मत अइयो
इनकी गली में सजन तू मत जइयो
जे मुई तोहे नजराय देंगी
मोहक हंसी कूं नजर लगाय देंगी
तोरी खुसिअन पे जाऊं मैं वारी वारी
तोरी हंसी मोहे सब जग तें प्यारी
जो तू हो उदास के नदिया है सूखी जाको पानी है खतम
सच जान पिया जाहे भरन के करूंगी जतन

सब कहें हैं के जे बौरा गयी है
प्रेम धुन रटत है...पगला गयी है
मोहे तो इन लोगन पे हंसी बडी आवे है
जे सब बातें मोरा मन बहलावें है

मूढ नहीं जानेंगे प्रीत का होवे है
का है हार और जीत का होवे है
कोई इन्हें समझावे... कोई तो जे बतलावे...
मैने करौ है सौदा खरा खरा
कोई व्यौपारी परखे तो जाने जामे लाभ बडा

के अब मोहे अपने जतन नाहीं करने
हंसने और जीने के परयत्न नाहीं करने
तोरी खुशी मोहे हंसी दे जावेगी
तोरी नींद मोहे रतिया सुलावेगी
तू जीमेगो मेरी भूख मिट जावेगी

ऐसो सौदा कोई लाला का करेगो
सोची बूझी ऐसी कोई चाल का चलेगो
मोरी समझ जे जग नाहीं समझेगो
प्रीत के खेल के नियम सारे उल्टे हैं
सुलझाय सो है उलझे, उलझान वाले सुल्टे हैं

जे बातें बुद्धिहीन अभइ नाहीं जानेंगे
जब हम हो जैहें भव सागर से पार
हो के सजन प्रेम नैया पे सवार
तब जे पढेंगे... तब जे जानेंगे

सच कहती थी पगलिया... तब पहचानेंगे

Thursday, January 21, 2010


वो छंद में बंधता नहीं
वो काव्य में ढलता नहीं
उन्मत्त-सा उन्माद है
जो काग़जों में थमता नहीं

वो आकाश सम छतरी है मेरी
उसका छोर भी मिलता नहीं
वो प्रेम की गठरी है मेरी
जिसका सिरा कभी खुलता नहीं

वो मीत है...वो प्रीत है...
उसकी मुस्कान ही मेरी जीत है
ग़र संग मेरे वो है खडा तो
दुर्भाग्य भी भयभीत है...

ग़र फल मेरी मुस्कान हो...
मेरी खुदी, मेरा सम्मान हो
तो श्रम से वो थकता नहीं...

पर छंद में बंधता नहीं
वो काव्य में ढलता नहीं

Sunday, January 3, 2010

इक शख्स...मेरा अक्स...


तुम पानी में हिलते प्रतिबिम्ब से लगते हो... मेरा प्रतिबिम्ब
मेरी हर अनकही सुनते हो...
मेरी हर अनसुनी कहते हो...
लगता है जैसे मेरी सांसें जीते हो
जब सामने होते हो तो जैसे आंखों ही आंखों में मेरा अक्स पीते हो

झिलमिल करते... जगमग से... पानी से झांकते हो...
मेरी हंसी हंसते हो...
मेरे आंसू रोते हो...
मेरे सपने सजाये अपनी आंखों मे
तुम मेरी नीदें सोते हो...

जानती हूं कि तुम बस मेरे लिये जीते हो...फिर भी डर लगता है
जब पानी पर बना... झिलमिलाता.... जगमगाता...
तुम्हारा प्रतिबिम्ब... हक़ीकत के किसी कंकड से टूट जाता है...

लेकिन हर बीतते दिन के साथ ये डर दूर होता जा रहा है...
क्योंकि ऐसे ढेरों कंकड सहने के बाद भी...
तुम बस डगमगाते हो...
एक पल को ओझल होते हो नजरों से फ़िर वापस आ जाते हो...
मैं जब भी तुम्हें पानी में ढूंढने को झुकती हूं...
तुम मुस्कुराते हुये... पानी से झांकते दिख जाते हो...
कितनी आसानी से मेरा हर डर दूर कर...
... मेरे चेहरे पर खुशी के रंग बिखेर जाते हो