Tuesday, May 11, 2010

पराजित


मैं अंधेरे में ना जाने किस से समर किया करती हूं
मैं कुछ अपनों और कुछ परायों की मौत हर रोज़ जिया करती हूं

हासिल नहीं इस ज़द्दोज़हद से कुछ भी,
फिर भी जाने क्यूं ज़िद किया करती हूं?

समझाते हैं सभी कि,
ग़र मेरा है तो कहीं जा नहीं सकत और
ग़र पराया है तो मुझे पा नहीं सकता

मग़र मैं उसे पाने को 'रब से मन्नत' औ 'ज़माने से मिन्नतें' किया करती हूं
मैं कुछ अपनों और कुछ परायों की मौत हर रोज़ जिया करती हूं

Friday, February 5, 2010

पगलिया उवाच्!!!


पिया तोरा जादू मोरे सिर चढ बोले
तोरी बातें सुन मन इत उत डोले
ना सूझे मोहे का है सच और का है झूठ
जो तू कहे सूरज में नाहीं गरमी तो सूरज से जाऊं रूठ

हंसती हैं मोपे सखी सहेली सारी
मोहे छेडें, सतावे और खावें मोरी गाली
पिया इनकी नजर में तू मत अइयो
इनकी गली में सजन तू मत जइयो
जे मुई तोहे नजराय देंगी
मोहक हंसी कूं नजर लगाय देंगी
तोरी खुसिअन पे जाऊं मैं वारी वारी
तोरी हंसी मोहे सब जग तें प्यारी
जो तू हो उदास के नदिया है सूखी जाको पानी है खतम
सच जान पिया जाहे भरन के करूंगी जतन

सब कहें हैं के जे बौरा गयी है
प्रेम धुन रटत है...पगला गयी है
मोहे तो इन लोगन पे हंसी बडी आवे है
जे सब बातें मोरा मन बहलावें है

मूढ नहीं जानेंगे प्रीत का होवे है
का है हार और जीत का होवे है
कोई इन्हें समझावे... कोई तो जे बतलावे...
मैने करौ है सौदा खरा खरा
कोई व्यौपारी परखे तो जाने जामे लाभ बडा

के अब मोहे अपने जतन नाहीं करने
हंसने और जीने के परयत्न नाहीं करने
तोरी खुशी मोहे हंसी दे जावेगी
तोरी नींद मोहे रतिया सुलावेगी
तू जीमेगो मेरी भूख मिट जावेगी

ऐसो सौदा कोई लाला का करेगो
सोची बूझी ऐसी कोई चाल का चलेगो
मोरी समझ जे जग नाहीं समझेगो
प्रीत के खेल के नियम सारे उल्टे हैं
सुलझाय सो है उलझे, उलझान वाले सुल्टे हैं

जे बातें बुद्धिहीन अभइ नाहीं जानेंगे
जब हम हो जैहें भव सागर से पार
हो के सजन प्रेम नैया पे सवार
तब जे पढेंगे... तब जे जानेंगे

सच कहती थी पगलिया... तब पहचानेंगे

Thursday, January 21, 2010


वो छंद में बंधता नहीं
वो काव्य में ढलता नहीं
उन्मत्त-सा उन्माद है
जो काग़जों में थमता नहीं

वो आकाश सम छतरी है मेरी
उसका छोर भी मिलता नहीं
वो प्रेम की गठरी है मेरी
जिसका सिरा कभी खुलता नहीं

वो मीत है...वो प्रीत है...
उसकी मुस्कान ही मेरी जीत है
ग़र संग मेरे वो है खडा तो
दुर्भाग्य भी भयभीत है...

ग़र फल मेरी मुस्कान हो...
मेरी खुदी, मेरा सम्मान हो
तो श्रम से वो थकता नहीं...

पर छंद में बंधता नहीं
वो काव्य में ढलता नहीं

Sunday, January 3, 2010

इक शख्स...मेरा अक्स...


तुम पानी में हिलते प्रतिबिम्ब से लगते हो... मेरा प्रतिबिम्ब
मेरी हर अनकही सुनते हो...
मेरी हर अनसुनी कहते हो...
लगता है जैसे मेरी सांसें जीते हो
जब सामने होते हो तो जैसे आंखों ही आंखों में मेरा अक्स पीते हो

झिलमिल करते... जगमग से... पानी से झांकते हो...
मेरी हंसी हंसते हो...
मेरे आंसू रोते हो...
मेरे सपने सजाये अपनी आंखों मे
तुम मेरी नीदें सोते हो...

जानती हूं कि तुम बस मेरे लिये जीते हो...फिर भी डर लगता है
जब पानी पर बना... झिलमिलाता.... जगमगाता...
तुम्हारा प्रतिबिम्ब... हक़ीकत के किसी कंकड से टूट जाता है...

लेकिन हर बीतते दिन के साथ ये डर दूर होता जा रहा है...
क्योंकि ऐसे ढेरों कंकड सहने के बाद भी...
तुम बस डगमगाते हो...
एक पल को ओझल होते हो नजरों से फ़िर वापस आ जाते हो...
मैं जब भी तुम्हें पानी में ढूंढने को झुकती हूं...
तुम मुस्कुराते हुये... पानी से झांकते दिख जाते हो...
कितनी आसानी से मेरा हर डर दूर कर...
... मेरे चेहरे पर खुशी के रंग बिखेर जाते हो

Sunday, December 20, 2009

दिल्ली


थमा थमा लगता है ये शहर कभी कभी

हर पल भागता है, फिर भी लगे सूना
इसके शोर में भी सन्नाटा सुनाई दे
जमा जमा लगता है ये शहर कभी कभी
थमा थमा लगता है ये शहर कभी कभी
रिश्तों की क्दर तो इसने कभी नहीं की
हर चीज बनी खिलवाड्, हर चीज से दुश्मनी की
धुआं धुआं लगता है ये शहर कभी कभी
थमा थमा लगता है ये शहर कभी कभी
ये रंग बदलता है कई रूप ये धरता है
फिर भी न जाने क्यूं मुझे कुरूप ही दिखता है
सूना सूना लगता है ये श्ह्र कभी कभी
थमा थमा लगता है ये शहर कभी कभी
ये हंसी को है मारे, हर ग़म को संवारे
हर आदमी दूसरे का काम बिगाडे
फ़ना फ़ना लगता है ये शहर कभी कभी
थमा थमा लगता है ये शहर कभी कभी

Tuesday, November 17, 2009

!!!!!!!


वो धार है पानी की
अपनी रौ में बहता हुआ
बेखबर...बेअसर...
मगर...हर जिन्दगी को छूता हुआ...

उसकी शीतल छुअन हर तपन से आजाद करती है...
उसकी कल-कल की आवाज मेरी खामोशी से बात करती है...

कभी लगता है जैसे मैंने अपने प्यार के बांध से उसे रोक लिया है
और कभी...लगता है कि मैं उसके साथ बह रही हूं...
उसकी हर बात अपने होठों से कह रही हूं...

और् सच कहूं तो मैं बह जाना चाहती हूं उसके साथ...
चाहती हूं कि वो थामे मेरा हाथ और कर ले खुद से करीब...

चाहे ये करीबी मुझे डूब के हासिल हो...
भले हो जाएं वापसी के सारे रास्ते बंद मगर वो मेरी मंजिल हो
कि जो...

धार है पानी की
अपनी रौ में बहता हुआ
बेखबर...बेअसर...
मगर...हर जिन्दगी को छूता हुआ...

Tuesday, October 6, 2009

आत्मसमर्पण


मैं जब भी भ्रम और हक़ीकत में से किसी एक को चुनना चाहती हूं
मैं जब भी खुद को निश्चिन्त और किनारे पर पाती हूं
तुम सब कुछ बदल देते हो... मुझे फिर से मझधार में धकेल देते हो...

क्योंकि, तुम्हारी मर्जी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता
तुम ना चाहो तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ नहीं मिलता

तो मत दो... ना खुशी...न हंसी...ना आजादी...ना खुदी
बस्...मुझे सपने न दिखाओ...
रोज जिताने की आशा दिखा कर...नित नये खेल ना खिलाओ...
तुम नहीं समझोगे सपने टूटने की तकलीफ़ ...
मेहनत से रंगे पन्नों पर स्याही बिखरने की तकलीफ़...

क्योंकि, तुम्हारी मर्जी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता
तुम ना चाहो तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ नहीं मिलता

मेरी शिकायतों पर हंस देते हो तुम...
कहते हो... मैं तुम्हें लडना सिखाता हूं
चुनौतियों से भिडना सिखाता हूं...
झूठ... तुम बस अपना खेल जमाते हो...
साथी-सखा कह कर ऐसा खेल खिलाते हो...
कि जिसमें नियम हैं तुम्हारे, लोग भी तुम्हारे हैं...
खेला है तुम्हारा...सदा तुम जीते और हम हारे हैं

क्योंकि, तुम्हारी मर्जी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता
तुम ना चाहो तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ नहीं मिलता

किन्तु अब मुझमें सामर्थ्य नहीं बची...
हारा खेल खेलने नहीं रही मेरी रुचि...
मैं हार मानती हूं सदा के लिये...टूटी अब हर आशा मेरी...
खुश हो जाओ अब तो... खत्म हुई प्राप्ति की पिपासा मेरी...
अब मुझे जीने दो बस जीने के लिये...
अपनों को हंसाने के लिये... उनके अश्रु पीने के लिये...
उम्मीद है कि ये देना तो दुष्कर ना होगा...
इतना तो दे ही सकते हो तुम...

आखिर, तुम्हारी मर्जी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता
तुम ना चाहो तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ नहीं मिलता