Saturday, July 14, 2012

जुगनू सरीखे रिश्ते...




मेरी उदासी (जो अमूमन बेवज़ह होती है) को, बहला-फुसला कर या शायद थोडी बहुत रिश्वत दे कर, वो घर आते ही बाहर निकाल करता है. और फिर अपनी कहना शुरु करता है, इस बात से बेखबर कि मैं सुन भी रही हूं या नहीं. उसकी किस बात का मुझ पर क्या असर हो रहा है इस बात की उस रत्ती भर भी फिक्र नहीं नहीं. ज़रा भी फुर्सत नहीं कि मेरे पास बैठ कर घडी दो घडी मुझे देख बर ले या कि अपनी निगाहों क एक सुरक्षा कवच मेरे गिर्द बुन दे, वो जानता है कि इसके लिए उसकी आवाज़ ही काफी है.
अपनी धुन में मगन वो कुछ ढ़ूंढ रहा है.. तकियों के नीचे, दरवाज़ों के पीछे, चीनी के डिब्बे मे, गहनों के लॉकर में...
क्या???
ये जानने में ना मेरी दिलचस्पी ना बताने की उसे फुर्सत. पूरे घर को तितर-बितर कर दिया है... डिब्बे-डिब्बियां, बर्तन, फर्नीचर सब उसे गुस्से से घूर रहे हैंऔर वो सब पर अपनी आवाज़ का मरहम रखता जा रहा है, अपनी रौ में बोले जा रहा है जाने क्या क्या...

और मैं... मैं उसके इर्द-गिर्द होने के अहसास भर से पुरसुकून दीवार से पीठ टिकाये, आंखें बंद किए बैठी हूं.. लम्हा-लम्हा उसकी आवाज़ का कतरा-कतरा खुद में जज़्ब कर रही हूं जो मेरे कानों से होती हुई मेरी रग-रग में उतर कर बह रही है...

उसकी सांस इतनी उथल-पुथल करने में बेतरह तेज़ हो गई है, इतनी तेज़ कि इस खाली घर में ऐसे सुनी जा सकती है जैसे वो सामने ही बैठा हो...और फिर जब ये आवाज़ एक झटके के साथ अचानक मुझसे लिपटती है तो मालूम होता है कि वो वाकई बेहद करीब बैठा हुआ है... एकदम सामने.

"यार वो नई वाली का भी पहले से एक boy friend है... "

और फिर मेरी खिलखिलाहट बिखरे सामान से बचती-टकराती सारे घर मे घूम आती है.

"चलो रे... लडकी गई तो गई मगर जो ढूंढ रहा था वो तो मिला..."

"मेरा पूरा घर तहस-नहस किये बिना तुझे कुछ मिलता क्यूं नहीं?"

"गलती तेरी है... मेरे आते ही बता क्यूं नहीं दिया कि यहीं नाक के नीचे छिपा रखी है ये बत्तीस दांतों वाली perfect smile..."

जाने कैसा तो दर्द गले को तर कर जाता है, मुश्किल से उसका नाम ज़ुबान से फूटता है...

"कमल..."

"ओये, ज़रा सी तारीफ क्या कर दी मुस्कुराहट की ऐसे छिपा ली जैसे नज़र ही लग जायेगी."

"बकवास बंद कर और ये सब समेट जो बिखेरा है."

"बिखरा हुआ समेटने ही तो आया हूं."

"u are late boy... आधा हिस्सा हवा के साथ हवा हो गया और आधा पानी में घुल कर पानी. अब समेटने को कुछ नहीं."

"तो ऐसा समझ लो कि मैं अवशेषों को सहेजने आया हूं"

उसकी उंगली मेरे चेहरे के तिलों को एक imaginary line से जोडती हुई रेंग रही है और जैसे सब उजला-उजला दिख रहा है नीम अंधेरे में भी. उसे बांहों में भर लेने की तलब फिर से मेरे दिल से मेरी उंगलियों की तरफ फिसलने लगी है.

"तू हर बार मुझे अधमरा छोड कर वापस जिलाने क्यूं आ जाता है?"

"मैं क्या करूं कि मेरी जान तुझमें बसती है... मैं खुद की जान लेने का कोई ऐसा तरीका नहीं जानता जो तुझे घायल ना करे. चाकू उठाऊं तो तेरी कलाई पर लाल निशान उभर आते हैं... फन्दा बनाऊं तो तेरी आवाज़ गले में अटक जाती है. मैं हर बार खुद को मारने की तैयारी कर लेता हूं और हर बार तेरी तडप देख कर जीने की तलब होने लगती है. सांसें अमृत हो जाती हैं और धडकन.. धडकन संजीवनी.

मेरे आंसू उसकी मुस्कुराहटों में घुल रहे हैं और मेरी हंसी उसके आंसुओं को सोख रही है. इस पूरे बिखरे घर में हमारे लिए कहीं जगह नहीं.. या शायद इस पूरी दुनिया में हम दोनों के लिए बस एक ही पनाह है...

एक-दूसरे की बांहों से एक-दूसरे के इर्द-गिर्द खडे किये गये इन बेहद मज़बूत मकानों में ... जिन्हें हम रोज़ तोडते हैं, रोज़ बनाते हैं... रोज़ बिखेरते हैं, रोज़ सजाते हैं... हम हर रात साथ-साथ जन्म लेते हैं और हर भोर साथ-साथ मर जाते हैं...

Sunday, June 24, 2012

ज़िन्दगी से परे...






आज़ाद... हर डर, हर दर्द, हर दुश्चिंता से परे मैं चल रही हूं पानी की लहरों पर. पीठ पर परों का हल्का-सा बोझ है लेकिन मन ऐसा हल्का जैसे कपास के फूल से हवा के साथ बह चला कोई रोंया...

एक नज़र मुड कर देखती हूं क्षितिझ के पास उन लोगों के धुंधले चेहरों को जो मुझे घेरे बैठे हैं. जाने दूरी या मेरी आंखों की नमी की वज़ह से कुछ भी साफ-साफ दिखाई नहीं देता...इस सब को बिसरा कर मैं, मेरे और तुम्हारे दरम्यान की दूरी को पाटते इन्द्रधनुष पर दौडी चली आ रही हूं.

इस इन्द्रधनुष का छोर ठीक तुम्हारे कमरे कि खिडकी पर खुलता है. सामने तुम मेरी तस्वीर पर आंखें गडाये बैठे हो, सिसकने की आवाज़ साफ सुन सकती हूं मैं... शायद तुम्हें भी लगता है कि मौत मुझे तुमसे दूर ले गई है जबकि मौत केवल एक रास्ता भर थी तुम्हारे नज़दीक आने का. पागल लडके...इधर देखो, मैं और भी नगीच हो गई हूं तुमसे, देह के भी फासलों को मिटा कर.

ओफ्फो... लैपटॉप पर मेरी ये तस्वीर छोडो अब, देखो तो तुम्हारे इश्क़ के लिबास मे लिपती मेरी रूह कितनी दमक रही है आज. अब तुममें और मुझमें कोई दुराव-छिपाव नहीं. तुम मेरे आर-पार देख सकते हो और मैं तुमसे एकाकार हो सकती हूं...

Wednesday, April 25, 2012

तुम्हें सोच कर...



"बुद्धू... गंवार... अनपढ... पागल लडके"
"क्या बात है! आज बहुत प्यार आ रहा है?"
"किसी को बुद्धू, गंवार, अनपढ तब कहते हैं क्या कि जब प्यार आता हो? तुम तो सच में ही पागल हो."
"अरे हां, तभी तो कहते हैं... तुम्हें नहीं पता?"
"नहीं... सब कुछ तुम्हें ही तो पता होता है."
"हां, ये भी है. चलो फिर हम ही बता देते हैं कि ये सब तब कहते हैं जब खूब... खूब...खूब प्यार आ रहा हो लेकिन छुपाना बताने से ज़्यादा आसान लगे."
"और जब कोई किसी को नालायक कहे तब? तब भी क्या सामने वाले पर टूट कर प्यार आ रहा होता है?"
"हां, तब भी... फर्क बस इतना है कि तब आप छुपाना नहीं, जताना चाहते हो"
"ह्म्म्म्..."
"समझीं... नालायक लडकी?"
"...."
"...."
"...."
"क्या हुआ? सच में समझ गईं क्या?"
"तुम्हारी बकवास सुन लें वही क्या कम है जो समझने की भी मेहनत करें?"
"फिर खामोश क्यूं हो गई थीं?"
"तुम्हें ये बताने के लिए कि हम हद वाला पक जाते हैं तुम्हारे फालतू फण्डों से.."
"इतना बुरा लगता हूं?"
"इससे भी ज़्यादा बुरे लगते हो."
"आच्छा???"
"हां... इतने बुरे... इतने बुरे कि अगर सामने होते तो तुम्हारी उंगलियां काट लेते ज़ोरों से"
"उंगलियां?"
"हां... उंगलियां. क्योंकि ये जादू जानती हैं, लिखती हैं तो मन कोरा कागज़ बन जाना चाहता है... छूती हैं तो पत्थर की मूरत..."
"फिर तो इन्हें सच में ही सज़ा मिलनी चाहिये कि ये उसकी जान सोख कर मूरत बना देना चाहती हैं जिसमें मेरी जान बसती है."
"अबे तेरे की!!! डायलॉग!!! "
"शुरु किसने किया था?"
"उसने जिसे शुरुआत से डर नहीं लगता."
"फिर तो वो तुम हरगिज़ नहीं हो सकतीं. तुम्हें तो आगाज़ से बडा डर लगता है."
"तब तक कि जब तक अंजाम के सुखद होने का भरोसा ना हो."
"और अगर मैं कहूं कि कोई मुश्किल तुम्हे छू भी नहीं पायेगी, तो?"
"तो मैं मान जाऊंगी... तुम कितने भी बुरे सही, झूठे नहीं हो."
"और?"
"और... हां!!!"
"उस सवाल के लिए जो आज सुबह मैंने पूछा था?"
"नहीं, उस कुल्फी के लिए जिसके लिए कल ना कह दिया था... ओफ्फो! तुम सच मे ही बुद्धू हो लडके."
"और बुद्धू लडका तुम्हें पा कर बहुत खुश है."
"और???"
"और ... और.. I Love You"
"Oh! say something else boy. I hate predictable people."
"ओके... तुम.. तुम बहुत बडी वाली नालायक हो."
"ह्म्म्म्... अब सुनने में नॉर्मल लग रहा है."

इस बात को बरसों बीत जाने के बाद भी लडकी को लडके की उंगलियां बिल्कुल पसन्द नहीं हैं कि आज भी लडके का लिखा पढ के वो सब भूल कर कोरे यौवन के दिनों में पहुंच जाती है.. आज भी अगर लडका उसे छू भर ले तो पल दो पल को सांस ऐसे थम जाती है जैसे सच ही मूरत बन गई हो...

Wednesday, April 11, 2012

हुआ है कभी ऐसा.. तुम्हारे साथ???

वो रात-बेरात अपनी अधपकी नींद से एक झटके के साथ उठ कर बैठ जाती और फिर तमाम दराजों को टटोलने लगती. जबकि ये बात उसे भी पता होती कि वो जो ढूंढ रही है उसे अगर दराजों में सहेज कर रखा जा सकता तो खुदा ने इंसान को आंसुओं की नेमत नहीं बख्शी होती और इंसानों ने नींद की दवाओं का आविष्कार नहीं किया होता.

जब मनचाही चीज़ कहीं किसी कोने में नहीं मिलती तो उसे अपने चेहरे पर ढूंढने के लिये वो कमरे में लगे आदमकद शीशे के सामने खडी हो जाती और उस सुकून को खोजने की कोशिश करती जो मां के चेहरे पर बिखरा रहता था लेकिन अपने चेहरे पर उसे अपने पिता से विरासत में मिली कठोरता और व्यावहारिकता के मेल से बनी कोई अजीब-सी चीज़ फैली हुई मिलती.

तब वो खुद से बातें करने लगती.. खुद से भी नहीं, किसी और से जो भले उस कमरे मे मौजूद नहीं था लेकिन लडकी की रग-रग में बडे हक़ के साथ बसा हुआ था. उससे तेज़ आवाज़ में पूछती...



पार की है कभी एक रात से अगली सुबह तक की दूरी खुली आंखों से? वो भी तब जब मालूम हो कि हर दर्द से पनाह बस नींद ही दे सकती है... मगर नींद के आगोश में छुप जाना मुश्किल लगा हो क्योंकि आंखें बंद कर के इस दुनिया से मुंह फेर कर आप एक नई दुनिया ज़िन्दा कर लेते हो... खुद के भीतर.

कभी सोने से डर लगा है कि नींद अब वैसे सपनों का हाथ पकड कर नहीं आती जिनके टूट जाने का अफसोस होता हो?

कभी बांए हाथ के किसी नाखून को दांए कंधे पर ज़ोर से कुछ ऐसे गडाया है कि दर्द की लहर कई देर तक बदन में बहती रहे? फिर उस दर्द को अपने जिस्म की चौकीदारी में छोड कर गये हो कभी तन की सरहदों और मन की हदों के पार?

... और ठीक उन्हीं पलों में खुद से मीलों दूर इत्मिनान से सोते किसी शख्स की आवाज़ सुनने की तलब बही है आंखों की कोर से कान के पास वाले बालों को भिगोती हुई?

यादों के दरवाज़े को ज़ोरों से भडभडा कर गिडगिडाए हो कभी कि बस एक बार वो खुल जाएं और लौट आने दे बिसरी बातों, बिछडे लोगों को वापस तुम्हारे पास?

नहीं... तुमने ऐसा कुछ भी, कभी भी महसूस नहीं किया. वरना उस रोज़ तुम्हारी चौख़ट से वापस लौटते हुये मेरी गीली आंखों ने खिडकी के शीशे के परे तुम्हारी पीठ पर पसरी बेपरवाही को मेरा मज़ाक बना कर हंसते ना देखा होता... तुम्हारी सिगरेट के धुंए मे ही सही, कहीं तो तुम्हारी आंखों की नमी दिखती मुझे...

मेरे दर्द को समझने के लिये तुम्हें दौडना होगा किसी अजनबी के पीछे बेतहाशा, दोनों हाथ हवा में उठाए किसी अपने का नाम पुकारते हुए.. करनी होगी अपनी मनपसंद किताबों से बेपनाह नफरत और... सीखना होगा हुनर चीखों से संगीत निचोडने का...

और शायद तब तुम जान पाओ कि मेरी आवाज़ में जो रिसता था, वो मेरा इश्क़ था.. तुम्हारे लिये. जब दर्द ही दवा सरीखा लगने लगेगा और दुआओं से भरोसा उठ जायेगा तब तुम जान पाओगे की मुहब्बत करना कितना मुश्किल काम है...

जब मेरी ज़िन्दगी के ये सारे दर्द तुम्हारे अंदर ज़िन्दा हो जाएं और कहीं किसी कोशिश, किसी नुस्खे, किसी टोटके से कोई आराम ना मिले तब... तब बस एक बार मुझे दिल से याद करना.. बस एक बार शिद्दत से मेरे नाम को पुकारना. बस उतना भर कर देने से ही मैं तुम्हें अपने सारे खून माफ कर दूंगी. अपने अंदर के 'मैं' की हत्या के इल्ज़ाम से बरी कर दूंगी... बाइज़्ज़त.

और ये सब इस्लिये नहीं कि तुम्हें चाहती हूं, बल्कि इसलिये कि ऐसा ना कर पाने तक मैं खुद भी आज़ाद नहीं हो पाऊंगी.

पता है, हर सांस मरना और हर मौत जीना आसान नहीं है. ये ऐसे है जैसे किरच-किरच दर्द को खरोंच कर खुद से होते हुए बहने का न्यौता देना और फिर ज़ार-ज़ार रोना... जैसे ज़ख्मों को चीखों में तब्दील होते हुये देखना और उन चीखों का वापस जिस्म से टकरा कर ज़ख्मों में बदल जाना... जाने तुम समझ भी रहे हो या नहीं, लेकिन ये सच में उतना ही मुश्किल है जितना तुम्हारा मुझसे मुहब्बत और मेरा तुमसे नफरत करना...

Friday, March 30, 2012

पूर्वाभास...

शादी होने से पहले लडकियां जैसे सपने देखती हैं, वैसा कोई सपना ना उसे सोते हुये आया... ना जागते हुये ही. जाने कैसे, अपनी पसंद के लडके शादी करते हुये भी उसे ये लगता रहा कि वो गहनों और भारी कपडों से लदी-फदी, खिलखिलाती हुई अपनी मौत की तरफ एक-एक कदम बढा रही है.

शादी वाले दिन भी उसके चेहरे पर हया या चाल मे थमाव नहीं... वो इधर-उधर की दुनिया से बेपरवाह किसी बच्चे की तरह चल रही है जो मगन भाव से गलियों में गुब्बारे वाले के पीछे फिर रहा हो... उसकी मां उसे बार-बार टोक रही है कि हंसे कम, नज़रें झुका कर चले लेकिन वो मंत्रमुग्ध सी मुस्कुराते हुये बस मां का चेहरा देखे चले जा रही है. मुझे उसे देख कर जाने क्यूं लगा कि वो किसी असर तले है और उसे मां के हिलते होंठ तो दिखाई दे रहे हैं लेकिन उनसे फूटते बोल उसके कानों तक नहीं पहुंच रहे हैं.

जाने क्यूं मुझे लगा जैसे उसका सारा ध्यान अपनी मां की नाक के बांईं तरफ वाले एक मस्से पर केन्द्रित है, फिर मुझे याद आया कि ठीक वैसा ही एक मस्सा उसकी भी नाक पर था लेकिन अब नहीं है. जैसे किसी गलती की सज़ा के तौर पर उसे इस विरासत से बेदखल कर दिया गया हो... शायद शिशिर से प्रेम विवाह करने की सज़ा के तौर पर.

सब लोगों को लग रहा है कि वो बहुत खुश है लेकिन जाने क्यूं मुझे लगता है जैसे वो सोच-समझ से परे वाली किसी हालत में है और एक मुस्कुराहट किसी हवा के झोंके के साथ उड कर उसके चेहरे पर आ कर उलझ सी गई है.

मेरे साथ वाली कुर्सी पर बैठी अधेड उम्र की वो औअरत बडबडाती-सी है, "शिशिर की बहू तो लाज-हया सब मैके में ही छोड आई है.".. या ऐसा ही कुछ और. उन्हें पता नहीं कि वो जीने लायक सांसें भी मैके में ही छोड आई है.

वो और शिशिर हाथों में वरमाला लिए एक्-दूसरे के ठीक सामने खडे हैं ... वो अपनी बडी आंखों को और भी फैला कर मौजूद लोगों की भीड को एक ओर से दूसरे छोर तक देखती है. कुछ ऐसे, जैसे.. जैसे कोई दुल्हन कभी नहीं करती. मानो हर शख्स का मन टटोल रही है.

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हालांकि अभी तक आपने सोचा नहीं है लेकिन इस बात की पूरी सम्भावना है कि आप सोचें कि मुझे उसके बारे में सब कुछ इतनी तफसील से कैसे पता है??? इस से पहले कि आप मुझे उसकी कोई करीबी सहेली समझ लें, मैं आपको बता देना चाहती हूं कि ये सब उसने मुझे खुद बताया था. तब, जब वो वाकई अपनी मौत की तरफ बढ रही थी.. बल्कि मुझे कहना चाहिये कि तब, जब मैं उसे उसकी मौत की तरफ धकेल रही थी.

उसके हाथों को बांधने के बाद जब मैंने ब्लेड को उसके गले की उभरी हुई नस पर रखा तो उसने सहम कर अपनी आंखें नहीं भींच लीं, वो चिल्लाई भी नहीं. उसने बस मुस्कुरा कर कहा कि शादी वाले रोज़ से ही उसे लगता था कि वो अपनी मौत की तरफ एक-एक कदम बढ रही है. ये भी कि, वो खुश है आखिरकार उसकी सोची कोई एक बात सच होने जा रही है.

एक मरते हुये इंसान के होठों पर आपका नाम कितना मुर्दा लगता है ये मुझे तब ही मालूम हुआ जब उसने कहा कि, "जानती हो मारिया, आज तक मेरी कही कोई बात सच नहीं हुई. जैसा कि अक्सर होता है कि आप बिजली गुल होने का डर ज़ाहिर करें और बस उसी पल कमरे में अंधेरा हो जाये, या कि मेरे कहने भर से कोई क्रिकेट टीम मैच जीत जाये... ऐसा कोई संयोग मेरे साथ कभी नहीं घटा. मैं दुनिया की सबसे अच्छी बेटी होने का भ्रम लिए चौबीस साल जीती रही. शिशिर मुझसे प्यार करता है, ये भ्रम भी पांच-छः साल मेरे गिर्द लिपट रहा..."

इतना कहते-कहते उसकी नस से खून की कुछ गर्म बूंदों ने फिसलना शुरु कर दिया था और मुझे ताज्जुब था कि उसकी आवाज़ में दर्द नहीं था, शायद वो इतना सह चुकी थी कि दर्द की सीमाओं से परे पहुंच चुकी थी...उसका बोलना अभी भी जारी था...

"मुझे हमेशा से लगता था कि मेरी शादी के फेरे मेरी मौत की तरफ बढने वाले रास्ते के कुछ एक मोड भर हैं. जीवन में मुझे सिर्फ एक बात का पूर्वाभास हुआ है... मेरी मौत का. शायद मैं आज पहली बार खुशी को उसकी पूरी पूर्णता के साथ महसूस कर पा रही हूं मार्...
...
..."

वो शायद और भी कुछ कहना चाहती थी लेकिन मैं अपना नाम उसके लगभग मुर्दा हो चुके होठों से फिर से नहीं सुन सकती थी. इसलिये उसे धीरे-धीरे यातना दे कर मारने का इरादा छोड कर मैंने एक झटके में उसे आज़ाद कर दिया.

लेकिन उसकी शादी वाले दिन जो मुस्कुराहट उसके चेहरे पर हवा के किसी झोंके के साथ आ कर अटक गई थी, वो आज उसके निश्चल होठों पर भी उसी बेफिक्री के साथ पसरी हुई थी.

उसे अपना पूर्वाभास सही होने की शायद वाकई बेहद खुशी थी...

Wednesday, March 21, 2012

तुम मेरे जानने वालों में सबसे बुरे हो लडके...


बचपन में अम्मा अक्सर भूत-प्रेत, ऊपरी असर, ना जाने कौन्-कौन सी अलाओं-बलाओं से बचाने के लिये झाडा लगवाने ले जाती थीं. ज़रा जुकाम हुआ नहीं कि नज़र उतारने के बीसियों टोटके तैयार... आज अगर वो होतीं तो पूछते कि फरिश्तों के असर से निज़ात दिलाने के लिए कहीं कोई झाडे नहीं लगते, कहीं कोई तन्त्र-मन्त्र नहीं करता क्या कि मेरी रूह पर लम्बे अरसे से एक फरिश्ते ने कब्ज़ा कर रखा है...

फरिश्ता है इसलिये कोई खास तक़लीफ तो नहीं देता लेकिन ये भी क्या कम कोफ्त है कि आप पर आपसे ज़्यादा किसी और का हखो जाये? आप हंसना चाहो और तभी फरिश्ते की कोई उदासी आ कर होठों से सारी मुस्कुराहट सोख ले जाये... उलझनों से आजिज़ आ कर आप मौत के साथ एक long drive पर जाने की तैयारी में हो कि बस फरिश्ता हाथों में हाथ डाले किसी अनजान राह पर दूर तक पैदल ले जाये और रास्ते में कमर पर उंगलियां फेर कर इस तरह गुदगुदाये कि आपकी हंसी से बंध कर तमाम खुशियां ज़िन्दगी में चली आयें.

वो मुझे मेरी ज़िन्दगी जीने का सच में एक दम ही कोई मौका नहीं देता और मैं उस से इतनी नफरत करती हूं जितनी कि मैंने बचपन में किसी से अपने रंग चुरा लेने पर भी नहीं की होगी.

बेशक वो फरिश्ता है लेकिन अपनी (और अब उसके साथ बंटी हुई) ज़िन्दगी में मैं जितने भी लोगों से मिली हूं उनमें वो सबसे बुरा है... सबसे बुरा. और उसकी सबसे बुरी बात ये है कि जब मैं उसे ये सब कहती हूं तो उसे पता चल जाता है कि ये बस एक तरीका भर है उसे बांहों में भर लेने को उठने वाली तलब को झिडक कर वापस सुला देने का...

Tuesday, March 20, 2012

बस... एक आवाज़ भर है!!!


ये भी क्या कम सुकून है कि तुम्हारी आवाज़ मेरी पहुंच के बाहर नहीं है कि इसे तुम खुद ही सहेज गये हो शायद मेरे ही लिये. तुम्हारा अक्स कभी छाया बन कर मेरी आंख की पुतली से नहीं गुज़रा. तुम्हारी खुश्बू कभी मेरी सांसों के साथ जकडी हुई मेरे फेफडों में पहुंच कर हमेशा के लिए कैद हो कर नहीं रह गई. लेकिन, तुम्हारी आवाज़... तुम्हारी आवाज़ मेरे खुले बालों को हौले से परे हटा कर मेरे कानों को सहलाती हुई जाने कौन-से रास्ते से मेरे दिल तक पहुंची है.
और अब तुम्हारी आवाज़ दिन-रात मेरे अंदर बात-बेबात... वक़्त-बेवक़्त... तेज़ी से चक्कर काटती रहती है. जब बहुत ज़्यादा घुटने लगती है तब शायद दिल से उठ कर गले तक आती है. पल भर के लिए कोई गोला-सा फंस जाता है गले में, मैं देर तक अपनी ही आवाज़ सुनने को छटपटाती रहती हूं कि तुम तो जानते ही हो कि मुझसे सन्नाटा बर्दाश्त नहीं होता. ये सन्नाटा आपको खुद को समझने का कुछ वक़्त दे देता है और मैं अपने आप को समझ कर एक बार फिर सब कुछ उलझाना नहीं चाहती. ख़ैर.. गले में अटकी तुम्हारी आवाज़ कुछ देर बाद, कभी तुम्हारी याद 'की' हिचकी या कभी तुम्हारी याद 'में' सिसकी के साथ आज़ाद हो जाती हूं और फिर अंदर जैसे सब खाली हो जाता है...

और इस खालीपन को भरने के लिए गुस्सा, अवसाद... मेरी घुटती सांस और फंसती आवाज़ के जाने कितने संगी बिन बुलाये चले आते हैं. बडे हक़ के साथ मेरे अंदर आवारा टहलते रहते हैं... तब तक कि जब तक तुम्हारी आवाज़ एक बार फिर आ कर सब कुछ आबाद ना कर दे, किसी ज़िम्मेदार मां की तरह अपनी बेटी के बिगडैल दोस्तों को झिडक कर भगा देती है... मायके से कई रोज़ बाद लौटी गृहस्थिन की तरह अपने अस्त-व्यस्त घर को, पति को और पति की फूंकी सिगरेटों के अधजले टुकडों को देखती है और बस पल्लू कमर में खोंस कर वो सब कुछ निकाल बाहर करती है जो बेवज़ह है.

कहने को बस एक आवाज़ भर है लेकिन कितनी मुकम्मल.. कितनी पूरी है. और नासमझों को लगता है कि इश्क़ करने के लिए किसी शख्स की ज़रूरत है जब मैं बताती हूं कि बस एक आवाज़ भर है जो मुझे अरसे से उलझाये हुये है.

एक आवाज़...जिससे आज कल मेरा इश्क़ परवान चढ रहा है.