Monday, July 6, 2009

...जो तुमने दिया


हां याद आती है तुम्हारी;
जब कोई पूछता है, पीठ पर ये निशान कैसे हैं?
जब कोई पूछे वजह मेरी खामोशी की
उस वक्त तुम्हें भुला देना नामुमकिन होता है,
जब कोई बात करता है... दुख की, दर्द की...

औएर सबसे ज्यादा तुम्हें याद करती हूं तब...
जब मेरी बेटी हंसती है, मुस्कुराती है...
क्योंकि;
तुमने ही तो दिया है ये सब...
...ये निशान,
...ये खामोशी,
... और मेरी बेटी

व्यतिक्रम


गूंजता शोर से संसार है
तो खामोश सितारे भी हैं
दर्द का मंजर आंखों में ला देता है पानी
पर आंखों से दिल में उतर जायें वो नजारे भी हैं
माना सागर अनंत और अपार है
लेकिन इसके किनारे भी हैं
ठोकर दे कर गिराने वलों की कमी नहीं
मगर बेलों को मिले सहारे भी हैं
शिकायत पतझड़ की करने वालों ने गौर नहीं किया शायद
मौसम के साथ आयी बागों में बहारें भी हैं

Monday, May 4, 2009

असमंजस


एक ख़्वाब जो देखा करती थी
एक बात जो सोचा करती थी
जिस्को मैं सपना कहती थी
सपने में जीती रहती थी

वो सपना अब सपना ना रहा
वो कुछ ऐसे अब पूरा हुआ
कि अब मुझको डर लगता है
मन मेरा उस से डरता है

जिनको मैंने सच माना था
वो सारे भ्रम अब टूट गये
जिनको मैंने भ्रम जाना था
वो सच बन कर यूं लूट गये

जाने ये कैसी बात हुयी
कैसे संग दिन के रात हुयी
मुस्कान में आंसू ऐसे मिले
बहती धारा में जैसे रेत चले

अब साथ मेरे कुछ भी ना रहा
मनमीत गया, मन भी ना रहा
सच भी ना रहा, भ्रम भी ना रहा
फिर भी हालात से लडती हूं

कल मेरा उज्जवल हो ना हो
मैं आज भी सप्ने बुनती हूं
हर आहट पर कान लगाये हूं
खुशियों की आवाजें सुनती हूं

रिक्ति


जो नहीं मिला तुझे मुझे उस्की तलाश है
जिन्दगी बिन तेरे बेरंग पलाश है
मैं ढूढ्ती,मैं पुकारती
मैं यहां वहां निहारती
तेरे साथ की मुझे अब भी प्यास है
जिन्दगी बिन तेरे बेरंग पलाश है

हर जगह, हर कहीं ढूढे मेरी नजर उसे
हां वही कि तू नहीं हासिल कर सका जिसे
हमारे उस घरौदे की मुझे अब भी आस है
जिन्दगी बिन तेरे बेरंग पलाश है

Saturday, April 18, 2009

खुशी की खोज...


आज सोचा खुशी ढ़ूढ़ेंगे, एक चेहरे प हंसी ढूढेंगे
अगर व्यस्त ना हो आप तो आयें, मिल कर हम सभी ढ़ूढेंगे
सबसे पहला निशाना मन्त्री जी के घर को बनाया,
किन्तु उन्हें विपक्ष ने बहुत सताया,
उन्होने अपना दुखडा सुनाया, हमने उन्हें दिलासा दिलाया

अगला पडाव एक अधिकारी का घर था,
किन्तु उन्हे आयकर विभाग का डर था,
उन्होने भी स्वयम को दुखों से ग्रस्त बताया, जाने कितनी परेशानियों से त्रस्त बताया

तो यहां भी हमारी मन्शा न हुई पूरी, हंसी देखने की इच्छा रही अधूरी
लेकिन हमें कहां चैन था, खुशी देखने को मन बेचैन था

अब हमने अपने शुभ कदम एक धनी व्यवसायी के घर रखे,
और वे भी हमारा उद्देश्य पूरा ना कर सके
क्योंकि उन पर टूटा दुखों का पहाड था, बिखरता दिख रहा घर बार था

अब मैंने सोचा 'मोनाली' नसीब में ही खुशी नहीं,
भटकी सारे दिन लेकिन मिली हंसी नहीं...
निराश हो बोझिल कदमों से घर की ओर लौटने लगी,
तभी मेरी नजर किसी मजदूर के बच्चे पर पड़ी...
उसके पास न धन था, ना पद था,
फिर भी चेहरे पर अनोखा तेज, अनोखा मद था

क्योंकि उसका मन था निष्पाप, दिल मे थी सच्चाई
तब लाख बातों की एक बात समझ मे आयी

खुशी के दो पलों के लिये धन दौलत नही चहिये,
मिल जायेगी खुशी अभावों मे भी... "उसे ढ़ूढ़ने को वक्त तो लाइये"

Monday, April 6, 2009

प्रतीक्षारत ...


जब जब मैंने उसको देखा, सदा प्रतीक्षारत पाया
विधाता ने उसके भाग्य में लिखा असमंजस का साया
करती है परिश्रम कठोर, भीषण सूर्यताप में
ना थकते देखा है उसको वर्षा के उत्ताप में

और करती है मौन प्रतीक्षा... थोड़ा सा धन पाने को
जिसका करती है दोहन, दो जून के खाने को
घर जा कर छोटे बालक को प्यार से पुचकारती है
भूख से व्याकुल उसके मुख को कातरता से निहारती है
आटे में कुछ पानी मिला कर उसकी भूख मिटाती है
सुख की आस करे ईश्वर से किन्तु प्रतीक्षा ही पाती है

इसी प्रतीक्षा के पूर्ण होने की बीस साल प्रतीक्षा करती है...

अब म्रतप्राय देह उसकी उस पुत्र की राह तकती है
जो गया था दवा को लाने और अभी ना आया है

त्याग देती है प्राण अभागिन, म्रत्यु संदेश जो आया है
किन्तु साया प्रतीक्षा का अभी ना हटने पाया है
निश्चल शव पड़ा है उसका
कफन नहीं मिल पाया है...

अंततः ...


अंततः मेरे ही सम्मुख आओगे
सत्यता मुझमें ही शामिल पाओगे
चख लो नीर करोड़ों सागर का, किन्तु मिठास गंगाजल में ही पाओगे
कदम से कदम मिला ले भले कोई
मित्रता का सार मुझसे ही पाओगे

अंततः मेरे ही सम्मुख आओगे
सत्यता मुझमें ही शामिल पाओगे

एक बार हाथ बढाकर देखो
फिर कोई दीवार कभी ना पाओगे
म्रत शरीर को कंधा दे देंगे कई
दुःख ढोने को हाथ मेरा ही पाओगे

अंततः मेरे ही सम्मुख आओगे
सत्यता मुझमें ही शामिल पाओगे

हंसी ठिठोली कितने ही करते रहें
आंसुओं से परिचय मेरा कराओगे
लाख होंगे साहिल पर हाथ थाम कर चलने वाले
मझधार में जो किनारा दे वो कश्ती मेरी ही पाओगे