Tuesday, November 17, 2009

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वो धार है पानी की
अपनी रौ में बहता हुआ
बेखबर...बेअसर...
मगर...हर जिन्दगी को छूता हुआ...

उसकी शीतल छुअन हर तपन से आजाद करती है...
उसकी कल-कल की आवाज मेरी खामोशी से बात करती है...

कभी लगता है जैसे मैंने अपने प्यार के बांध से उसे रोक लिया है
और कभी...लगता है कि मैं उसके साथ बह रही हूं...
उसकी हर बात अपने होठों से कह रही हूं...

और् सच कहूं तो मैं बह जाना चाहती हूं उसके साथ...
चाहती हूं कि वो थामे मेरा हाथ और कर ले खुद से करीब...

चाहे ये करीबी मुझे डूब के हासिल हो...
भले हो जाएं वापसी के सारे रास्ते बंद मगर वो मेरी मंजिल हो
कि जो...

धार है पानी की
अपनी रौ में बहता हुआ
बेखबर...बेअसर...
मगर...हर जिन्दगी को छूता हुआ...

Tuesday, October 6, 2009

आत्मसमर्पण


मैं जब भी भ्रम और हक़ीकत में से किसी एक को चुनना चाहती हूं
मैं जब भी खुद को निश्चिन्त और किनारे पर पाती हूं
तुम सब कुछ बदल देते हो... मुझे फिर से मझधार में धकेल देते हो...

क्योंकि, तुम्हारी मर्जी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता
तुम ना चाहो तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ नहीं मिलता

तो मत दो... ना खुशी...न हंसी...ना आजादी...ना खुदी
बस्...मुझे सपने न दिखाओ...
रोज जिताने की आशा दिखा कर...नित नये खेल ना खिलाओ...
तुम नहीं समझोगे सपने टूटने की तकलीफ़ ...
मेहनत से रंगे पन्नों पर स्याही बिखरने की तकलीफ़...

क्योंकि, तुम्हारी मर्जी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता
तुम ना चाहो तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ नहीं मिलता

मेरी शिकायतों पर हंस देते हो तुम...
कहते हो... मैं तुम्हें लडना सिखाता हूं
चुनौतियों से भिडना सिखाता हूं...
झूठ... तुम बस अपना खेल जमाते हो...
साथी-सखा कह कर ऐसा खेल खिलाते हो...
कि जिसमें नियम हैं तुम्हारे, लोग भी तुम्हारे हैं...
खेला है तुम्हारा...सदा तुम जीते और हम हारे हैं

क्योंकि, तुम्हारी मर्जी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता
तुम ना चाहो तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ नहीं मिलता

किन्तु अब मुझमें सामर्थ्य नहीं बची...
हारा खेल खेलने नहीं रही मेरी रुचि...
मैं हार मानती हूं सदा के लिये...टूटी अब हर आशा मेरी...
खुश हो जाओ अब तो... खत्म हुई प्राप्ति की पिपासा मेरी...
अब मुझे जीने दो बस जीने के लिये...
अपनों को हंसाने के लिये... उनके अश्रु पीने के लिये...
उम्मीद है कि ये देना तो दुष्कर ना होगा...
इतना तो दे ही सकते हो तुम...

आखिर, तुम्हारी मर्जी के बग़ैर पत्ता भी नहीं हिलता
तुम ना चाहो तो लाख कोशिशों के बाद भी कुछ नहीं मिलता

Wednesday, September 9, 2009

तेरी खातिर...


मैं खुद से ही दूर होती गई
खुद ही जाने क्यूं खोती गई

तुझे जीतने की यूं ख्वहिश जगी
मैं तुझमे ही खुद को डुबोती गई
तेरी भोर से आखें मेरी खुली
तेरी रात से मेरी पलकें मुंदी
तेरी खुशी से लब खिल उठे
तेरे दर्द में ये नैना झरे

मैं तुझमें ही गुम होती गई
मैं खुद से ही दूर होती गई

मैं तेरे इशारों पर चलती रही
तुझको ठोकर लगी,मैं संभलती रही
अपनी खुशी तो ना देखी कभी
मैं तेरे लिये ही बिखरती रही

मैं तुझमें ही गुम होती गई
मैं खुद से ही दूर होती गई

सब पूछें क्या पाया, क्या खोया मैने?
किसकी खातिर हर सपना है धोया मैंने?
कुछ खो कर है पाया, पा कर कुछ खो दिया
बस तेरे लिये नहीं ग़म बोया मैंने
हर विरासत तेरी संभालने के लिये
मैं कंटकों से हंस के गुजरती गई
कर्तव्य की पगडण्डी पर चलते हुये
'मोनाली' हर पल न्यौछावर होती गई

तेरी इक प्यार भरी मुस्कान को
तेरी जुबां को और तेरे सम्मान को
मैं अपनी खुदी को ही खोती गई

मैं तुझमें ही गुम होती गई
मैं खुद से ही दूर होती गई

Monday, September 7, 2009

यादें...


तेरी यादें जेहन में आया करेंगी
उम्र भर हंसाया रुलाया करेंगी
तन्हाईयों में भी ना तन्हा करेंगी
वो बातें मुझे गुदगुदाया करेंगी
बनायेंगी मुझको ये बार बार
बना कर के खुद ही मिटाया करेंगी
मेरी जिन्दगी को वीरान बनाने
तेरी यादें जेहन में आया करेंगी
उम्र भर हंसाया रुलाया करेंगी

कांच की किसी किरच की तरह
दिल में कसक छोड जाया करेंगी
मेरे ख्वाब में तुमको सजाकर ये यादें
नीदें मेरी ये चुराया करेंगी
भीतर तक मुझे तोड जाने
तेरी यादें जेहन में आया करेंगी
उम्र भर हंसाया रुलाया करेंगी

सजायेंगी तेरी खुशियां मेरे लबों पर
मेरी आखों से गम तेरे बहाया करेंगी
ना जाने क्यूं कर बनी हैं ये दुश्मन
रुलाकर मुझे खिलखिलाया करेंगी
हमेशा तुम्हें मेरे पास रखने
तेरी यादें जेहन में आया करेंगी
उम्र भर हंसाया रुलाया करेंगी

Thursday, August 27, 2009

सफ़र...

देखती हूं रेल की खिडकी से झांक कर
कहीं धरा उर्वर तो कहीं है बंजर
कहीं झुकी डालियां तो कहीं पतझड
मौसम के हर वार को सह कर खडे हैं पेड अक्खड

कहीं पहाड, कहीं नाले, कहीं नदी
कुछ गांव भरे पूरे, कुछ ऐसे जैसे वीरान सदी
कहीं गूंजते कहकहे दूर तक, कहीं आंसुओं से खुश्क चेहरे पत्थर
देख्ती हूं रेल की खिडकी से झांक कर

Tuesday, July 7, 2009

सोचा ना था


हर कही अनकही जीनी होगी, सोचा ना था
ये बातें कडवी पीनी होंगी, सोचा ना था
रिश्तों की जिस चादर को ओढ़ॅ, महफू समझते थे खुद को
वो चादर इतनी झीनी होगी, सोचा ना था

जीवन पर अपना वश ना होगा, सोचा ना था
रिश्तों में कोई रस ना होगा, सोचा ना था
जब खुशियां बांटते चलते थे, तब नही किसी ने समझाया
हिस्से में खुशियां थोडी होंगी, सोचा ना था

सब संगी साथी छोड़ने होंगे, सोचा ना था
नाते अप्नों से तोडने होंगे, सोचा ना था
गैरों की जिस महफिल में अजनबी-से लगते थे चेहरे
अब इन्हीं अजनबी चेहरों में फिर से अप्ने खोजने होंगे, सोचा ना था

सब हमसे ऐसे रूठेंगे, सोचा ना था
हम भीड में तन्हा खडे रहेंगे, सोचा ना था
हम तो सोचे बैठे थे, उम्र भर की पूंजी जमा हुयी
रिश्ते भी डाल के ताले तिजोरियों में भरने होंगे, सोचा ना था

अधूरा ख्वाब


जानती थी पूरा ना होगा
फिर भी ये ख्वाब देखना चाहती थी
अपनी सुनहरी यादों की किताब में,
ये अनुभव भी समेटना चाहती थी
अंदाजा था मुझे... है ये क्षणिक, जल्द ही टूटेगा
और कल बनेगा वजह तक्लीफ की

इसलिये जी भर कर हंस लेना चाहती थी

जानती थी पूरा ना होगा
फिर भी ये ख्वाब देखना चाहती थी

ख्वाब में थी मैं और धुंधला सा एक साया था साथ
धीरे से आगे बढ कर जिसने हाथों में लिया था हाथ

इस छुअन को बखूबी पहचानती थी
और सच के धरातल पर कभी महसूस ना कर पाऊंगी इसे,
ये भी मानती थी

मगर... ख्वाब में ही सही,
ये सफर पूरा करना चाह्ती थी

जानती थी पूरा ना होगा
फिर भी ये ख्वाब देखना चाहती थी