बोनसाई का ये व्रक्ष
जो होना चाहता था विस्त्र्त्, असीम्, अनन्त
नापना चाहता था अन्तराल.. धरा और आकाश के बीच का
चाहता था फलो से लद जाना, नम्रता से झुक जाना
मस्त पुरवाई के साथ बौराना
पेड़ होने की सार्थकता पाना
लेकिन हसरतो की कलिया खो गई कला की आन्धी मे
हा आन्धी कला की...
लोग इसे कला ही कहते है
दूसरे के अस्तित्व को समेट कर प्रसिद्धि और प्रशन्सा के किले खड़े करना
किसी के असीम होने के स्वप्न को चारदीवारी मे बान्ध देना
और खुद को कलाकार का दर्जा देना
यही कला है?
लेकिन ये क्या?
ये बोनसाई तो हन्स रहा है
कहता है मै खुश हू
क्योकि आशा का दामन अभी छूटा नही है
उम्मीद से रिश्ता टूटा नही है
क्या हुआ जो मै यहा हू?
मेरे अन्श, मेरे बीज विस्त्र्त्, असीम्, अनन्त
नापेगे अन्तराल धरा और आकाश के बीच का...