
ग़म बांट के हल्का करने की कोशिश की थी
चाहे अनचाहे कुछ ज़ख्म हरे हो गये
मेरा दर्द सुनने की ख्वाहिश थी उन्हें बहुत
किस्सा सुने बिना ही फिर परे हो गये
छेड दिया कोई तार ऐसे कि रात आंखों में कट गई
दर्द-औ-ग़म का मालूम नहीं मग़र ये खबर बंट गई
मेरी कमदिली के किस्से मशहूर हो गये
वो फेंक के पत्थर ठहरे पानी में कहीं मशगूल हो गये
चंद अल्फ़ाज़ों में मेरा ग़म ढूंढना है फिज़ूल
जो चर्चे थे कभी महफिल में, अब राह की धूल हो गये
जिन्हें किताबों में रख के छोड दिया हो
किताब पर भी बोझ, हम वो फूल हो गये
लाख चाह कर भी सुधरे ऐसी सूरत नहीं कोई
हम चांद में दाग जैसी खुदा की भूल हो गये